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Incest मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह

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67 16.63%
जीजा साली की कहानी
11.41%
46 11.41%
पारिवारिक सेक्स की कहानी
47.15%
190 47.15%
पड़ोसन की कहानी
13.15%
53 13.15%
कोई भी हॉट कहानी
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Incest मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
rajbr1981 Offline
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#1,091
07-01-2017, 03:12 AM
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rajbr1981 Offline
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#1,092
07-01-2017, 07:54 PM
आप पर पढ़ रहे रहे मेरी कामुक बीवी बनी प्राइवेट रण्डी
मेरे हाथ उसके पीठ और पिठसे होते हुवे कमर पर घूमते हुवे उसके नितम्बों पर पहुंच गए. अब मै उसके बड़े बड़े नितम्बोंको जोर जोरसे दबाने लगा. उसकी उंगलिया मेरे नग्न पीठ पर धस रहे थे. उसके नाखुन मेरे पीठ पर चुभने लगे थे लेकिन एक अजबसा नशा दे रहे थे वे. मै मदहोश होते जारह था. अब मेरा हाथ उसके पेट पे पहुंच गया और असके मुलायम पेटको सहलाते हुवे उपरके तरफ यात्रा सुरु कर दिया. चढ़ने लगा अब वह पहाड़ियों पर.

अब मेरा हाथ धीरे धिरे रेंगते हुवे उसके पेट के उपरके पहाड़ियों पर चड़ने लगा था. पुरी ऊँचाई पर पहुंचनेके बाद वह पहाड के एक छोटी पर कुछ देर तक चहलकदमी करनेके बाद खायी मे उतर कर फिर दुसरी पहाड़ी के चोटी पर पहुंच जाता. वहां कुछ देर चहलकदमी करता और फिर उसी रास्ते से लौट कर पहले वाले पहाड़ी के सिखर पर पहुंच जाता.

सीमा मेरे हांथों के चहलकदमी से ब्याकुल होने लगी. उसके होंठों से सिस्कारियां फूटने लगे. उसके हाथ मेरे लुंगी के भीतर फुफकारते सांप को पकड़ने का प्रयास करने लगा. उसके इस प्रयाससे बौखलाकर सांप बार बार उसके हाथ पर ठोकर मारने लगा, मानो उसे डंस लेना चाहता हो.

मैंने उसके पहाडनुमा बक्षको ब्लाउज के उपरसे टटोलने लगा. उसके बक्षके चुचक कड़े हो गए थे. ब्लाउज के उपरसे हि मै बारी बारिसे दोनोको चुटकियों मे लेकर मसलने लगा. वह आनंद और उत्तेजना मे आकर मेरे लिंग को कस कस कर दबोचने लगी.

फिर सुरु हुवा एक दुसरेके शरीरसे कपड़ों को उतारनेका शिलशिला. सीमाने मेरे बदन पर लिपटे एक मात्र वस्त्र मेरे लुंगी को एक हि झटकेमे नोच कर फेक दी. मै तब तक उसकी साड़ी खिंच कर उसके बदनसे अलग कर चुका था. सीमाने मेरे झूलते लंडको पकड़ उसे सहलाना सुरु कर दिया. ब्लाउज के उपरसे हि मै उसकी बड़ी बड़ी चुंचियोंको पकड़ कर दबाने और मसलने लगा. फिर मैंने एक एक कर उसके ब्लाउज का सारा हुक्स खोल दिया और ब्रा मे कसे चुंचियोंको पकड़ कर दबाने लगा. कुछ देर चुंचियोंको दबाता और मसलता रहा फिर झुक कर उसके चुन्चियोंके बिच मुह रगड़ने लगा. अब मै ब्रा सहित उसकी एक चुंची मुहमे लेकर हौले हौले दांतों से दबाना सुरु किया. सीमाने अपने हाथसे ब्रा उपर सरकाकर अपनी एक चुंची बाहर निकल मेरे मुहमे सटा दिया.

उसकी चुचि बड़ी जानलेवा थी. चुंचिका आकर देख मै दंग रह गया. मुझे यकीन हि नही होरहा था कि उसकी चुंची इतनि सुन्दर हो सकती है. चुंची काफी बड़ी मेरे अंदाज़ से ३६B साइज़ कि रही होगी जिसके उपर बड़ी सी घुंडी थी जो बिलकुल तनी हुई और कठोर थी. घुंडी के चारों ओर एक भूरे रंग का बड़ा सा घेरा था जो उसके गोरी चुंची पर बहुतही खुबशुरत कंट्रास्ट पैदा कर चुंचिके खूबसूरती को बढ़ा रहा था. मै अपने आपको रोक नही पाया और उसकि दुसरी चुनिके उपरसे भी ब्राके कपको हटा उसे भी बाहर निकल लिया. यह भी बिकुल पहले वाली चुंचिकी जुड़वाँ बहनकी तरह हुबहू वैसी हि थी.

मैंने एक चुंचिकी घुंडी मुहमे लेकर बच्चों कि तरह चुसने लगा और दुसरी चुंचिकी घुंडी को चुटकी मे लेकर मसलने लगा. सीमाने खुद अपना ब्लाउज और ब्रा उतार दिया. मैंने अपना एक हाथ बढाकर उसकी पेटीकोट का नाडा खिंचकर ढीला कर दिया. पेटीकोट फिसलकर निचे गिर गया. अब वह भी पुरी तरह नंगी हो गई, उसने पैंटी नही पहन रखा था.

बड़ी फूली हुई थी उसकी बुर, एक दम डबल रोटी कि तरह. बालों का नामोनीसान नही था कहीं पर. बस यूँ समझो बुर नही चांदका टुकड़ा था. एक दम मख्खन जैसा था उसका बुर. मैंने उसे बिस्तर के तरफ ठेला तो वो खुद बेखुद चल कर बिस्तर पर बैठ गई. मै उसके बगल मे बैठ कर उसके गुलाबी होंठों को चुम लिया. मेरा एक हाथ उसकी चुंची पर पहुंच कर चुंचिको निचे से उठाने लगा, मानो उसके वज़नका अंदाज़ा लगा रहा हो. काफ़ी भरी थी उसकी चुंची. मैंने अपने दुसरे हाथ मे उसकी दुसरी चुंची ले उसके वजन का भी अंदाज़ा लगाया और दोनो चुंचियोंको एक एक हाथमे लेकर उमेठने लगा. मै उसके दोनो चुंचियोंको कचर कचर मसलने लगा.

सीमाने मेरा लंड अपने एक हाथ से पकड़कर जोरसे दबाई फिर छोड़ दी, फिर दबाई और छोड़ दी. उसने कई बार ऐसे हि लंडको मुठी मे दबाया और छोड़ा. मेरा लंड अपने पुरे जोश मे आ चुका था. लंडके मुह पर लार का एक बूंद निकलकर चमक रहा था. उसने अपना एक उंगली लारके बूंद पर रखा और अपना उंगली मेरे सुपाडे पर घुमाते हुवे पुरे सुपाडे पर फ़ैलाने लगी. उसकी इस हरकत से अजीब किस्मकी सनसनाहट फैलता चला गया मेरे अन्दर. मेरा पुरा शारीर गनगना उठा और और मेरे लंड से और लार टपकने लगा जिसे वह अपने उंगली से मेरे सुपाडे पर फैलाती गई. सुपाडा तर होकर चमकने लगा.

कमालकी कलाकारी दिखा रही थी वह मेरे लंड पर और मेरा पुरा शारीर गनगनाने लगा था. उसने अपनी उंगली लंडके सुपाडे पर रख उसे उपरसे निचेके तरफ दबाया. लंड थोडा नीचेको दबा और उसकी उंगली लंड परसे फिसल गया. एकाएक लंड स्प्रिंग के तरह उछल कर उपरके तरफ उठा और हिलने लगा. उसने फिर सुपाडे पर उंगली रख दबाया, लंड नीचेको झुका, उंगली फिसल गई, लंड उछला और थर्राने लगा. वह बार बार ऐसे हि लंड को दबाने लगी और हिलते लंडको बड़ी गौर से देखती रही.

उसकी कलाकारी ने मेरा हालत ख़राब कर दिया था. ऐसा मज़ा मुझे आज तक नही मिला था जो आज इसके साथ मिल रहा था. मैंने उसे बेड पर चित करके लिटा दिया और खुद उसके उपर चढ़ गया. मेरे होंठ उसके होंठों पर दबाव बढ़ा रहे थे, उसकी चुंचियां मेरे सिने से दब कर फ़ैल गए थे, जांघ जांघ पर सटे हुवे थे और लंड उसके पेंडु मे धस रहा था. मैंने अपना दोनो हाथ उसके कांख पर रख सहलाया, वह सिहरने लगी. मै अपने हांथों को उसकी बांहों पर रगड़ते हुवे उसकी हथेली पर पंहुचाया और उसकी उँगलियों मे अपनी उँगलियाँ पिरोकर दबाने लगा. वह भी मेरे उंगलियों पर अपनी पकड़ बढाती जा रही थी.

मै अपना होंठ और गाल उसके पुरे चेहरे पर रगड़ने लगा. उसने अपनी आँखें मूंद रखी थी मैंने उसके दोनो आँखोंको पारी पारिसे चुम लिया. उसने आँखे खोल दी. मैंने जब उसकी आंखोंमे झांक कर देखा तो गज़ब कि मस्ती, कमालकी नशा दिखयी दिया उन आँखों मे. आंखें एक दम गुलाबी होगयी थी उसकी. उसकी आँखोंकी रंगत ने मेरे अन्दर नशा सा भरने लगा. मै मदहोशी मे उसके आँखों मे खोने लगा.

उसके होंठ थरथरा रहे थे. मैंने उसके थरथराते होंठों पर अपना होंठ रख दिया. वह अपनी होंठ मेरे होंठों पर रगड़ने लगी. कुछ देर तक उसके होंठोंका रस पिनेके बाद मेरे होंठ उसके ठुड़ी के रास्ते गर्दन पर फिसलते हुवे छाती के तरफ का सफ़र शुरू कर दिया. अगले हि पल उसकी एक चुंची पर पहुंच वहां कुछ देर बिश्राम करनेको सोंचा लेकिन ललच गया उसकी गोलईयों को देख कर और वहीँ मर मुह मारने लगा.

कुछ देर तक चुंचियों पर मुह रगडनेके बाद मैंने भर लिया उसकी एक चुंचिको अपने मुह मे और चुसने लगा. उसकी चुंचियों चुसते हुवे मै उन पर दांत गड़ाने लगा. कभी उसकी घुण्डी को मुह मे लेकर चुभलाता कभी चुंचिका उतना हिस्सा मुह मे भर लेता जितना मेरे मुह मे अटता और कभी काटने लगता उसकी चुंची और चुंचिकी घुंडी को. मेरे इन हरकतों ने आग लगा दी थी उसके बदन मे. वह अपना होंठ चबाने लगी, छाती उठाने लगी और पैरोंको रगड़ने लगी थी और साथ हि साथ उसके मुहसे सिस्कारियां फूटने लगी थी. वह अपना पुरा शारीर ऐंठ रही थी.


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rajbr1981 Offline
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#1,093
11-01-2017, 02:48 AM
आप पर पढ़ रहे रहे मेरी कामुक बीवी बनी प्राइवेट रण्डी

मैंने उसके चुंचियों को छोड़ अब निचे का सफ़र तय करने लगा....

जी भर उसके चुंचियों का रसपान करनेके बाद मेरे होंठ उसके पहाडनुमा चुचियों के शिखर से निचे घाटिके तरफ का सफ़र तय करने लगे. मेरे होंठ सीमाके गुदाज़ पेट पे रेंगते हुवे उसके नाभि के इर्द गिर्द चहलकदमी करने लगे. जब मैंने उसके नाभिको चुम उसके गहराईमे अपने जिभका नोक ठोका तो वह एकदम से सिहर गई. उसके नाभि के अन्दर जमा पसीना भी बड़ा निराला और स्वादिष्ट लग रहा था जिससे मेरे नस नस मे अजीब सा नशा भरता जा रहा था.

शायद सीमाका हालत भी मेरे हि तरह था. वह आँखे मूंद अपना होंठ चबाती हुई पेट उठा कर सहयोग कर रही थी. वह अपने पैरोंको एक दुसरेके साथ कभी रगडने लगती थी और कभी एक दुसरेसे दुर कर फैला देती थी, लग रहा था अब वह अपने टांगों के तरफ बढ्नेको निमंत्रण दे रही हो. वह अपने होंठोंको पुरी ताकतके साथ भींचे हुई थी फिर भी कभी कभार उसके होंठों से सिस्कारियां फुट हि पड़ते थे.

अब मै उसके पेंडु पे रगडता हुवा अपना होठ उसके जन्घो के उपर घुमाते हुवे उसके पांव तक पहुंचा और उसके एक अंगूठेको मुह मे लेकर चुसने लगा. वह एक दमसे मारे उत्तेज्नाके तड़पने लगी. मै पारी पारिसे उसके दोनो पैरके अंगूठेको चूस रहा था.

मैने सीमाके दोनो टांगों को फैला उनके बिच घुटनों के बल बैठ गया और उसकी फूली हुई गुदाज़ बुरको गौरसे देखने लगा. एक दम मक्खन सरीखे बुरको देखनेका मज़ा हि कुछ और था. मैंने उसके केलेकी तने जैसे मोटे, चिकने और मुलायम जांघों पर अपना हाथ रख सहलाना सुरु किया. बड़ी हि नर्म जांघें थीं उसकी. जांघो को सहलाते सहलाते मेरी हथेलियां धीरे धीरे उसके मखमली बुर के तरफ बढ़ने लगे.

बुर पर मेरे हथेलियों का स्पर्श पाते हि उसकी चुतड उछल पड़ी, जांघों सहित पुरा पैर कांपने लगे, होंठ थर्राने लगे और चुंचियों कि घुन्डियाँ जो पहलेसे हि तनी हुई थीं और सख्त हो गए. उसकी हालत बता रही थी कि उसकि बुर अब लंड निगलने के लिए बेकरार हो रही है. मै कोई जल्दबाजी ना करते हुवे और मज़ा लेने के ख्यालसे उसके बुर पर धीरे धीरे हाथ फेरने लगा. उसकी बुरके दरार पर हलकासा दवाबके साथ मै अपने एह हाथका बिचला उंगली घिसने लगा. उंगली गिला होने लगा क्यूँ कि बुर गीली हो चुकी यही. गिलापनके कारण बुर चिपचिपी होगयी थी और उसपे उंगली बिना किसी रुकवाटके फिसल रहा था. मैंने थोडा दबाव बढाया और उंगली दरार मे धस गया. उसने अपने जांघोंको थोडा और चौड़ा करते हुवे फैला दिया जिससे बुर कि दोनो होंठोंके बिच हलका गहरा दरार बन गया. बुरके दोनो होंठ नारंगी के फांकों सा लग रहे थे.

बुरके दरारमे मै अपना उंगली घिसने लगा. बुरसे लगातार निकलते चिपचिपे पानीके वजहसे फिसलन काफी बढ़ गया था. मेरी उंगली उसके बुरके दरारमे उपर निचे फिसल रहा था. मैंने उंगली पर थोडा और दबाव बढाया, वह दरारमे फिसलते हुवे बुरके छेदमे समाने लगा. मैंने थोडा और दबाव बढाया तो वह उसके बुरकि गहराई मे डूबता चला गया, डूबता चला गया और मुझे लगाकि वह किसी गर्म भट्ठी मे समा गया हो. बुरके अन्दर बड़ी मदमस्त बसंती गर्मी भरी हुई थी जो बडा सुहावना लग रहा था.

मै उसके बुरमे अपने उन्गलिको आगे पिछे घुमाने लगा. उंगली सटासट अन्दर बाहर होने लगा. अपना आँख मूंदे वह अपनि थिरकते होंठोंको चबा रही हि. बदनको ऐठ रही थी और चुतड उचका रही थी. मैंने अपने दुसरे हाथके उंगली को भी बुर पर लगा दिया और दोनो हांथोंके उँगलियों के सहारे बुरके फांकोंको एक दुसरेसे अलग किया. बुरमे एक गुलाबी खायी बन गई जिसके उपरी सिरे पर एक चनेके दाने जैसा बडाही खुबसूरत उभार दिखाई दिया. मै अपने आपको रोक नही सका और फ़ौरन झुकते हुवे उसे अपने मुह मे भर लिया. मै अपने जिभ्के नोक्से उस हिस्सेको रगड़ना सुरु किया तो वह एक दमसे सिहर उठी और उसके मुहसे आआआह्ह्ह निकल पड़ा. उसने अपना बुर मेरे मुह्पे जोर से दबाया, छाती उपर उठाई और धमसे निचे पटक दिया. इसके साथ हि उसके बुर ने ढेर सारा पानी उगल दिया.

उसने मेरा बाल पकड़के जोरसे खिंचा, मै उसके उपर चढ़ गया और उसे अपने बाहोंमे कस लिया.... ........

मै सीमाके उपर चढ़ उसे अपने बाँहों मे कस लिया. उसने भी मुझे अपनी बांहों मे जकड रखा था. वह खल्लास हो चुकी थी लेकिन मेरा लंड पुरे तावमे था और उसके पेंडुमे धस रहा था. मैंने अपने हाथमे उसकी एक चुंची पकड़ मसलना सुरु किया. मै उसके चुंचिको मुहमे लेकर चुसने लगा. एक चुंचिको मुहमे लेकर चुसते हुवे मै उसकि दुसरी चुंचिको मसलता जा रहा था.

मेरा लंड उसके पेंडु पर घिस रहा था. धिरे धीरे वह फिरसे तैयार होने लगी. उसने अपना एक हाथ बढाकर मेरे लंड को पकड़ सहलाते हुवे अपने बुर पर रगड़ना सुरु किया. लंड और बुर दोनो तैयार थे. एक दुसरेके इतने करीब आनेके बाद भला कब तक सब्र करते. मौका मिलते हि मेरा लंड उसके बुरके गहराई मे समाने लगा. सीमाने अपनी टांगें और चौड़ी कर लि जिससे बुर थोडा फ़ैल गया. मैंने जोर लगाकर अपना लंड उसके बुरमे ठेला तो वह बुरको चीरते हुवे आधके करीब अन्दर चला गया. सीमा ने अपना शारीर कड़ा किया, होंठ भींचा लेकिन अब क्या होना था तब तक मेरा पुरा लंड उसके बुरमे समा चुका था.

उसके बुरमे अब मै अपना लंड अन्दर बाहर करना सुरु किया, पहले धीरे धिरे बड़ी धीमी गति मे मैंने उसे चोदना सुरु किया. बस बड़े आरामसे मै अपना लंड बाहर खींचता और धीरे धीरे पर एक कांस्टेंट स्पीड से पुरा लंड अन्दर डाल देता. फिर उसी तरह आरामसे बाहर निकलता और बड़े प्यारसे अन्दर पेल देता. अन्दर बाहर आते जाते लंड पर मै उसकी गर्म परन्तु चिकनी और मुलायम बुर के स्पर्श का बड़ा अनोखा अनुभव कर रहा था. इस धीमी गतिकी चुदाई मे आज मुझे कुछ अलग हि आनंद मिल रहा था, एक ऐसा आनंद जो आज तक मुझे नही मिला था.

सीमाने खोलकर अपनी दोनो पैर उपर उठा मेरे कमर पर लपेट लिया और दबाव बनाकर अपने तरफ खींचना सुरु किया. मेरा पुरा लंड उसके बुरकि गहराईमे बार बार ठोकर मारने लगा. उसने अपनी बाहें मेरे बगलसे निकल कर कंधोको जकड लिया. मै उसके होंठो को बार बार चुमते हुवे और उसकी चुंचियों को मसलते हुवे बड़ी तनमयता के साथ उसे चोदने लगा.


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rajbr1981 Offline
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#1,094
12-01-2017, 09:17 PM
आप पर पढ़ रहे रहे मेरी कामुक बीवी बनी प्राइवेट रण्डी
चोदायिका सुरुवात बड़ी धीमी गतिसे हुवा था. उसके बुरमे घुसता निकलता लंड बुरके छेदके दीवारके हरएक हिस्सेके स्पर्शका आनन्द उठाते हुवे अन्दर बाहर होरहा था. समय के साथ हि स्वचालित ढंगसे खुद बखुद आहिस्ते आहिस्ते लंड घुसने निकलनेका स्पीड बढ़ता जा रहा था. बुर मे आते जाते लंडके गतिसे ताल मिलकर उसकी कमर भी उपर निचे होते हुवे लंड़का स्वागत करने लगी थी.

अब लंड बड़ी तेजीसे उसके बुरमे आने जाने लगा था और वह भी उसी हिसाबसे कमर उठा उठाकर चुदवाने लगी थी. उसकि बुर कामरस से भर गई थी और मेरे हर धक्के पर उसके बुरसे फचफच का आवाज़ निकलने लगा था. अब मै गचागच उसके बुर मे पेलने लगा था. वह अपने पैरों को फैलाकर उपर उठा रखी थी. उसकी बड़ी बड़ी चूंचियां थल थल करके हिल रही थीं. मै कभी उसकि हिलती चुंचियों को निहारते हुवे चोदने लगता तो कभी उन्हें हांथों मे जकड कर हुमच हुमच कर धक्के मारने लगता और कभी कभार झुक कर उसके चुंचियों को तो कभी गालोंको चुमते हुवे उसके बुरमे लंड पेलने लगा.

अगले दस बारह मिनट तक लगातार घमासान चुदाई चलती रही. इस दौरान उसके मुहसे सिस्कारियां फूटती रही तो दुसरी तरफ उसके बुरसे फचर फचर का आवाज़ निकलता रहा. बुरपे पड़ते ठाप के वजहसे हिलते उसके पांवमे पहने पायल से छन छनका आवाज़ और हांथों कि चुडियोंसे निकलती खन खन कि आवाज़ वातावरणमे बड़ी मोहक संगीत घोल रहे थे. मेरे पीठ पर लिपटे उसके हांथों और कमरपे लिपटे पैरोंका कसाव बढ़ने लगा, साथ हि साथ उसके मुहसे निकलती सिस्कारियां तेज़ होने लगी, उसके सांसों कि गति बढती गई. वह हांफने लगी और अंतमे मुझे बड़ी कसके जकड़ते हुवे उसके बुर ने लावा उगल दिया. मै भी कगारपे पहुंच गया था. कस कसके कुछ और धक्के मारनेके बाद मेरे लंड ने भी उसके बुरमे बिर्य का धार छोड़ दिया और मै उसके उपर लुढ़क गया.

कुछ देर तक हम एक दुसरेसे लिपटे पड़े रहे. फिर वह मेरे होंठों को चूमती हुई मुझसे अलग हुई और अपने कपड़ों को उठा दुसरे कमरेमे घुस गई. कुछ देर बाद वह कपडे पहन लगभग भागती हुई मेरे घरसे निकल कर चली गई. घरके मेन गेट पर पहुंच पीछे मुड कर उसने एक तिरछी नज़र मेरे उपर डाला, मुस्कुरायी और चली गई. उसके चेहरे पर उस वक़्त बड़ी गहरी तृप्ति दिख रही थी.


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rajbr1981 Offline
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#1,095
23-01-2017, 08:07 PM (This post was last modified: 23-01-2017, 08:10 PM by rajbr1981.)
लण्ड न माने रीत

उस दिन माँ का फोन सुबह सवेरे ही आ गया ‘बेटा.. कैसे हो.. इस बार होली पर आ रहे हो ना.. कितने साल हो गए घर आए हुए?’
‘नहीं माँ.. मैं नहीं आ पाऊँगा.. ऑफिस से बहुत छुट्टियाँ ले चुका हूँ.. मार्च आने वाला है.. अब तो एक दिन की छुट्टी लेना भी मुश्किल है..। दो दिन तो आने-जाने में ही निकल जाएंगे.. फिर दो-तीन दिन रुकना भी पड़ेगा।’ मैंने अपनी मजबूरी बताई।

‘अच्छा.. वो आरती भी आई हुई है.. तुझे पूछ रही थी कि तू होली पर आएगा क्या.. क्या बोलूँ उसे?’
आरती का नाम सुनते ही मेरे बदन में मीठी सी सिहरन दौड़ गई.. अब कैसी होगी वो.. कैसी लगती होगी शादी के बाद..? ऐसे कितने ही प्रश्न मन में उठने लगे।
‘ठीक है माँ.. मैं कोशिश करूँगा आने की..’ मैंने कह दिया।
आरती मुझे याद करे और मैं न जाऊँ ये तो संभव ही नहीं था। होली आने में अभी 8-10 दिन थे। मैंने उसी दिन शताब्दी में रिज़र्वेशन करा लिया।

ट्रेन चल पड़ी थी.. और मैं आरती के ख्यालों में खो गया। वो अठरह बरस की कमसिन कच्ची कली थी.. उसे कितनी बेरहमी से रौंदा था मैंने उस दिन.. उसका वो करुण क्रंदन.. वो चीत्कार.. वो विनती.. आज भी मुझे स्मरण होती है.. जैसे अभी अभी की बात हो।
‘बाहर निकाल लो बड़े पापा.. मैं आपका पूरा नहीं सह पाऊँगी..!’ यह कहते हुए आरती की आँखों में आंसू उमड़ आए थे।

मैं भी उसकी हालत देख दुखी हो उठा था और पछता रहा था.. लेकिन अब क्या हो सकता था। समय का चक्र पीछे नहीं घुमाया जा सकता.. अब वापस लौटना बेवकूफी ही कहलाएगी। यही सोच कर मैंने उसके अर्ध-विकसित स्तन अपनी मुट्ठियों में भर लिए फिर मैंने अपने चारों और नज़र फिरा के देखा.. जेठ की उस तपती दुपहरी में चारों ओर सन्नाटा पसरा था.. दूर-दूर तक कोई नहीं था।

मैंने जी कड़ा करके अपने लण्ड को थोड़ा सा पीछे खींचा और दांत भींच कर.. पूरी ताकत.. बेदर्दी और बेरहमी से आरती की कमसिन कुंवारी चूत में लण्ड को धकेल दिया। मेरा काला.. केले जैसा मोटा और टेड़ा लण्ड उसकी चूत की सील तोड़ता हुआ चूत में गहराई तक धंस गया।
आरती के मुँह से ह्रदय विदारक चीख निकली थी और वो छटपटाने लगी। तोतों का झुण्ड जो डालियों पर बैठा आम कुतर रहा था.. डर के मारे टांय-टांय करता हुआ उड़ा और दूसरे पेड़ पर जा बैठा।
सहसा किसी ने मेरा कंधा पकड़ कर जोर से हिलाया.. यादों का सिलसिला टूट गया, मैंने चौंक कर देखा तो सामने टीटीई खड़ा था।

‘सर.. टिकट प्लीज.. कब से आवाज़ लगा रहा हूँ आपको..’ वो बोला।
‘ओह.. आई एम सारी..’ मैंने कहा और टिकट निकाल कर उसे दे दिया।
मित्रो.. अब तक की पूरी कहानी शुरू से सुनाता हूँ आप सबको। यह कोई इन्सेस्ट सेक्स कथा नहीं है.. यहाँ जिस आरती का जिक्र हो रहा है.. वो मेरे हम प्याला हम निवाला बचपन के लंगोटिया यार रणविजय सिंह की इकलौती पुत्री है। रणविजय को गाँव में सब लोग राजा कह कर बुलाते हैं।
मैं भी उसे राजा कह कर ही बुलाता हूँ।

हाँ.. तो राजा की गाँव में बहुत बड़ी हवेली है.. खेती-बाड़ी.. फलों के बगीचे सब कुछ है.. धन-दौलत की कोई कमी नहीं.. बहुत नेक और नरम-दिल इंसान है मेरा दोस्त.. बस पीने-पिलाने और अय्याशी का शौक है। मैंने और राजा ने मिलकर न जाने कितनी कुंवारी और शादीशुदा कामिनियों का मर्दन किया है, उनके बदन को जी भर के भोगा है.. लेकिन जोर-जबरदस्ती कभी किसी के साथ नहीं की थी..

राजा की पत्नी भी बहुत सुशील सुलक्षणा है.. कौशल्या नाम है उनका.. मैं उन्हें भाभी कह कर सम्मान से बुलाता हूँ।
जब आरती का जन्म हुआ.. तब मैं गाँव में ही था, वो मेरे सामने ही पैदा हुई.. मैंने उसे बचपन से तिल-तिल बढ़ते देखा है।
मुझे याद है कि आरती का स्कूल में एडमिशन करवाने भी मैं ही उसे अपनी पीठ पर बैठा कर स्कूल ले गया था।
मेरी गोद में खूब खेलती थी.. मैं जब भी राजा के घर जाता.. आरती मुझे देखकर खुश होकर चिल्लाती- बड़े पापा आ गए.. बड़े पापा आ गए…
मैं भी उसे प्यार से गोद में उठा लेता.. और बेटी की तरह ही प्यार-दुलार करता।
मैं राजा से उम्र में दो साल बड़ा हूँ.. शायद इसी कारण वो मुझे बड़े पापा कह कर बुलाती थी। उसे ये सब किसने सिखाया.. ये तो मुझे नहीं पता..
हम लोगों के दिन इसी तरह मौज-मस्ती में बीत रहे थे। फिर मेरी नौकरी सरकारी विभाग में लग गई और मुझे गाँव छोड़ कर जाना पड़ा।

घर में मेरी सिर्फ माँ है.. थोड़ी बहुत खेती वगैरह भी है.. जिससे हमारी गुजर-बसर बड़े आराम से हो जाती थी। नौकरी लगने के बाद मेरी भी शादी हो गई और मेरा गाँव जाना भी कम हो गया। कभी-कभी तो पूरा साल निकल जाता गाँव गए हुए..
इसी तरह एक दशक से ज्यादा बीत गया.. एक दिन की बात है.. मैं गाँव गया हुआ था.. जेठ महीने की प्रचण्ड गर्मी पड़ रही थी.. मुझे हल्का-हल्का बुखार लग रहा था।
शायद लू के कारण ताप चढ़ा था। मैंने सोचा कि कच्चे आम का पना पी लिया जाए.. तो आराम हो जाएगा। यही सोच कर मैं उस भरी दोपहरी में आरती के आम के बगीचे की तरफ चल दिया।

लू के थपेड़े जान लिए लेते थे.. चारों ओर सन्नाटा था.. बगीचे में कुछ आम नीचे गिरे पड़े थे.. मैंने वही उठा लिए और वापस जाने के लिए मुड़ा.. तभी मुझे कुछ दूर से कुछ लड़कियों के हँसने-खिलखिलाने की आवाजें आईं।
मैं चौंक गया.. भला इस तपती दुपहरी में ये कौन लड़कियाँ हैं.. जो ऐसे खिलखिला कर हँस रही हैं?
उत्सुकता वश मैं आवाज की दिशा में चल दिया.. कुछ ही दूरी पर घने पेड़ों का झुरमुट था और हँसने की आवाजें वहीं से आ रही थीं।

निकट जाकर देखा तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई.. और आगे जाकर देखा तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं.. मेरे सामने घनी झाड़ियों के झुरमुट में सात-आठ लड़कियाँ बिल्कुल नंगी.. गोल घेरे में बैठी थीं। सभी लड़कियों ने अपने पैर सामने की तरफ मोड़ रखे थे.. जिससे उनकी चूतें खुलकर दिखाई दे रही थीं।
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#1,096
23-01-2017, 08:12 PM
आप पर पढ़ रहे रहे लण्ड न माने रीत
मैं दबे पांव आगे बढ़ा और एक झाड़ी की ओट से देखने लगा.. उफ़.. क्या नज़ारा था.. मेरे ठीक सामने.. तीन लड़कियाँ बिल्कुल नंगी.. अपनी खुली हुई चूतों को सहला रही थीं। उनमें से दो को मैंने पहचान लिया.. मेरे ठीक सामने मेरे अजीज दोस्त राजा की बेटी आरती बैठी थी। उसके बगल में एक शादीशुदा औरत कुसुम बैठी थी.. जो अपनी चूत में दो उंगलियाँ घुसा कर जल्दी-जल्दी अन्दर-बाहर कर रही थी। उधर आरती भी अपनी चूत की दरार को आहिस्ता आहिस्ता सहला रही थी।

‘ले कुसुम भाभी.. ये घुसा अपनी चूत में.. उंगली से क्या होगा?’

किसी लड़की की आवाज़ आई और उसने एक लम्बा मोटा डिल्डो (कृत्रिम लण्ड) कुसुम की ओर उछाल दिया। कुसुम ने झट से उसे लपक लिया और इसका गोल सिरा अपनी जीभ से गीला करके अपनी चूत के छेद पर रख दिया और मेरे देखते ही देखते कुसुम ने पूरा डिल्डो अपनी चूत में ले लिया और फुर्ती से खुद को चोदने लगी।

ये सारी लड़कियाँ मेरे गाँव की ही थीं.. जिन्हें अब तक मैं बड़ी भोली-भाली.. सीधी-सादी कमसिन समझता था.. वो चुदासी होकर ऐसी बेशर्म हरकतें करेंगी.. यह मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।


यह आरती.. मेरे दोस्त की बेटी.. जो मेरे सामने पैदा हुई थी.. आज इतनी जवान हो चुकी थी कि..
मैंने आरती को गौर से देखा.. उसकी चूत का त्रिभुज उसकी गुलाबी जाँघों के बीच में पावरोटी जैसा फूला हुआ दिख रहा था। चूत के होंठ आपस में एकदम चिपके हुए थे.. जिन पर छोटी-छोटी मुलायम झांटें उग आई थीं.. उसके अल्प विकसित मम्मे छोटे-छोटे संतरों जितने थे.. उन पर निप्पल भी किशमिश के दाने की तरह थे लेकिन उत्तेजना से फूल कर उठे हुए थे..
आरती अपनी चूत को धीरे-धीरे सहला रही थी..

कुसुम ने डिल्डो अपनी चूत में कुछ देर करने के बाद आरती की ओर बढ़ा दिया..
‘ले आरती बन्नो.. अब इससे अपनी चूत की सील तोड़ ले..’ कुसुम बेशर्मी से हँसते हुए बोली।
‘धत्त.. मैं नहीं करती ये सब.. मेरी सील तो शादी के बाद ही तोड़ेगा मेरा होने वाला..’ आरती ने कहा और अपनी टाँगें सिकोड़ लीं।

‘अरे.. तू शादी होने तक अपनी चूत में बिना लण्ड लिए रह भी सकेगी?’ किसी लड़की की आवाज़ आई और वो सब खिलखिला कर हँस पड़ीं।

‘आरती की चूत का महूरत तो मैं अपने जीजू से करवाऊँगी.. वो आ रहे हैं शुक्रवार को.. वही तोड़ेंगे इसकी सील.. अपने काले मूसल से..’
आरती की बगल वाली लड़की बोल पड़ी और बेशर्मी से हँस दी।
‘शबनम.. तूने अपनी सील भी तो जीजू से ही तुड़वाई थी ना?’ कुसुम बोली।

‘हाँ कुसुम भाभी.. जीजू ने कैसे बेरहमी से से मेरी कुंवारी चूत फाड़ी थी.. वो मैं भूल नहीं सकती.. मैं रो रही थी.. दर्द से छटपटा रही थी.. मेरी चूत से खून बह रहा था.. पर जीजू ने ज़रा भी मुरव्वत न की.. पूरा पेल कर ही माने..’ शबनम बोली और डिल्डो कुसुम के हाथ से लेकर सट्ट से अपनी चूत में भर लिया।

‘रहने दे शबनम.. मैं तो अपने पास किसी को फटकने भी नहीं दूँगी.. मैं तेरे जैसी नहीं.. मैं चुदूँगी तो शादी के बाद ही..’ आरती बोल उठी और अपनी चूत मुट्ठी में भर ली।

ऐसे ही हंसी-ठिठोली करते हुए वे सब ये गन्दा खेल खेलती रहीं। मैं दम साधे वो सब देखता रहा.. मेरी कनपटियाँ गरम होने लगी थीं.. लण्ड तो पहले से ही खड़ा था.. अब उसमें हल्का-हल्का दर्द भी होने लगा था।
मुझे आरती पर क्रोध भी आ रहा था.. लेकिन मैं कुछ कर नहीं सकता था। मैं जैसे-तैसे खुद को संभाले था।
दोस्तो, मुझे पूरी उम्मीद है कि आपको मेरी इस सत्य घटना से बेहद आनन्द मिला होगा.. एक कच्ची कली को रौंदने की घटना वास्तव में कामप्रेमियों के लिए एक चरम लक्ष्य होता है.. खैर.. दर्शन से अधिक मर्दन में सुख होता है.. इन्हीं शब्दों के साथ आज मैं आपसे विदा लेता हूँ.. अगले भाग में फिर जल्द ही मुलाक़ात होगी।


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#1,097
24-01-2017, 01:13 PM (This post was last modified: 24-01-2017, 11:51 PM by rajbr1981.)
SAEEDA & LEAH VS BLACK MAN! WHO WINS?

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#1,098
25-01-2017, 12:13 AM
लण्ड न माने रीत -2
अब तक आपने पढ़ा..
ऐसे ही हंसी-ठिठोली करते हुए वे सब ये गन्दा खेल खेलती रहीं। मैं दम साधे वो सब देखता रहा.. मेरी कनपटियाँ गर्म होने लगी थीं.. लण्ड तो पहले से ही खड़ा था.. अब उसमें हल्का-हल्का दर्द भी होने लगा था।
मुझे आरती पर क्रोध भी आ रहा था.. लेकिन मैं कुछ कर नहीं सकता था। मैं जैसे-तैसे खुद को संभाले था।
अब आगे..
थोड़ी देर बाद उनका ये खेल खत्म हो गया और सब लड़कियाँ कपड़े पहन कर चल दीं। आरती ने वो डिल्डो एक कपड़े में लपेट कर वहीं एक झाड़ी में छुपा दिया। सबके चले जाने के बाद मैं भी घर लौट आया।
उस रात बिस्तर पर करवटें बदलते-बदलते आधी रात हो चुकी थी.. लेकिन नींद आने का नाम ही नहीं ले रही थी.. मुझे आरती को लेकर चिंता हो रही थी.. कैसी संगत में पड़ गई थी यह लड़की..
मैं जानता था कि लड़की का यौवन जब खिलना शुरू होता है.. उसी कच्ची उम्र में उसके फिसलने की सबसे ज्यादा सम्भावना होती है। उसे बहकाना बहुत आसान होता है.. क्योंकि उसके नाज़ुक अंग विकसित हो रहे होते हैं और उनमें पनप रहा उन्माद लड़की को बेकरार किए रहता है.. उसकी योनि स्वतः ही गीली होने लगती है.. उसमें मादक सिहरन की लहरें उठने लगती हैं और वो अपने ही कामरस में भीगी हुई कुछ कर गुजरने को बेचैन रहने लगती है। जैसे जब किसी छोटे बच्चे के नए-नए दांत निकलते हैं तो वो कुछ भी चबाना चाहता है.. कुछ भी उसके मुँह में डालो.. वो चबाना चाहता है.. इससे उसे बड़ी राहत और सुकून मिलता है।
ठीक यही हालत आरती की थी.. उन दिनों वो उमड़ती जवानी के बहाव में बहते हुए खुद को नहीं संभाल पा रही थी।
फिर मुझे उन लड़कियों के खेल का एक एक सीन याद आने लगा। उनका वो डिल्डो.. वो गन्दी-गन्दी बातें.. वो सब कुछ.. और फिर आरती का वो रूप..
मुझे लगा कि वो मेरे सामने अभी भी उसी तरह नग्न बैठी है और अपनी योनि की दरार में उंगली रगड़ रही है। उसके वो अल्प विकसित स्तन… उफ्फ्फ.. वो सब सोचते ही मेरा लिंग फनफना उठा और मेरा हाथ अनचाहे ही उसे सहलाने लगा।
आरती के बारे में सोच-सोच कर जैसे मैं अपने लिंग को सहलाते हुए उसे धीरज बंधा रहा था।
‘मादरचोद.. कुत्ते कमीने.. तुझे शर्म नहीं आती.. आरती के बारे में ऐसा सोचते हुए.. तेरे सामने उसका जन्म हुआ.. वो तेरे दोस्त की बेटी.. तेरी भी बेटी जैसी ही है..’
मेरी अंतर्रात्मा ने मुझे धिक्कारा..
‘साले.. याद कर, वो बचपन से ही तेरी गोद में खेली है.. और तू ही तो उसे गोद में उठा कर स्कूल लेकर गया था.. उसका एडमिशन करवाने.. वो तुझसे बड़े पापा.. बड़े पापा.. कहते नहीं थकती और तू ये अपना हथियार हाथ में लेकर उस बेचारी कमसिन कली को रौंदने की सोच रहा है..’
मेरी अंतरात्मा मुझे ऐसे ही तरह-तरह से धिक्कार उठी..
मैं पसीने-पसीने हो गया और अपने उत्थित लिंग को जबरदस्ती चड्डी में धकेल दिया और बाथरूम में जाकर हाथ-पैर.. मुँह धोया.. लौट कर ठण्डा पानी पिया और खुली हवा में जाकर बैठ गहरी गहरी साँसें लेने लगा..
इससे मन को कुछ हल्कापन महसूस हुआ तो फिर बिस्तर पर लेट कर सोने की कोशिश करने लगा।
लेकिन नींद कहाँ.. मेरे भीतर का कामुक पुरुष मेरी अंतर्रात्मा को पराजित करने की बार-बार चेष्टा करने लगा।
‘अबे चूतिये.. ज़रा सोच.. आरती जिस संगत में पड़ चुकी है.. उसमें वो बिना चुदे तो रहेगी नहीं.. तुझे याद नहीं उसकी सहेली.. वो शबनम क्या बोल रही थी? कि वो अपने जीजू से उसकी सील तुड़वा के रहेगी? आरती जैसी भोली-भाली नासमझ लड़की को वो किस बहाने कहीं ले जाकर किस-किस से चुदवा देगी। यह कौन जान सकता है??’
इससे तो अच्छा है कि तू ही सबसे पहले भोग ले.. उस कच्ची कुंवारी कली को.. वो कौन सी तेरी सगी बेटी है.. आखिर उसके बाप ने भी तो ऐसी-ऐसी कई कच्ची कलियों को खिला कर फूल बनाया है.. आज कुदरत ने उसकी अपनी बेटी को भी उसी राह पर ला दिया है और फिर ऐसा मौका ज़िन्दगी में पता नहीं फिर मिले या न मिले.. वैसे भी तेरे लण्ड ने कोरी चूत का खून नहीं चखा सालों से..’ मेरा दिल इस तरह मुझे दुनियादारी समझा रहा था।
ये सब बातें सोचते-सोचते मेरा लण्ड फिर से बगावत कर बैठा और तमतमा कर खड़ा हो गया और मैं आरती के बारे में सोचता हुआ अनजाने में ही मुठ मारने लगा।
जब मेरे लण्ड से लावा की पिचकारियाँ छूटीं.. तब जाकर मुझे कुछ राहत मिली।
अंततः मेरी अंतरात्मा की पुकार अनसुनी रह गई..

फिर मैंने सोच लिया था.. पक्का कर लिया था कि अब आगे कैसे क्या-क्या करना है।
ट्रेन अपनी पूरी रफ़्तार से मेरी मंजिल की तरफ दौड़ी जा रही थी। कभी-कभी कोई दूसरी ट्रेन क्रॉस करती तो मेरी तन्द्रा भंग हो जाती.. कल तक मैं गाँव पहुँच जाऊँगा.. अब कैसी लगती होगी आरती?
कुछ ही देर बाद अतीत के पन्ने फिर से मेरे सामने एक-एक करके खुलने लगे..
तो उस रात की अगली सुबह मैं बहुत जल्दी उठ गया और तैयार होकर आरती के बगीचे की ओर चल पड़ा.. सुबह की पुरवाई मुझमें एक अजीब सी मस्ती और जोश भर रही थी.. मैं मन ही मन आरती की साथ अपनी हवस पूरी करने की प्लानिंग बनाता हुआ तेज तेज क़दमों से चला जा रहा था..
जल्दी ही मैं झाड़ियों के बीच उस जगह पहुँच गया.. जहाँ कल दोपहर में लड़कियाँ चूत-चूत खेल रही थीं.. फिर मैंने एक झाड़ी में छुपा वो कपड़े में लिपटा डिल्डो खोज निकाला।
कपड़ा हटा कर देखा तो वो एक लकड़ी का बना हुआ करीब सात इंच लम्बा और ढाई इंच मोटा बेहद खूबसूरत लण्ड था। एकदम चिकना और हूबहू असली लण्ड जैसा.. गोल तराशा हुआ… चिकना सुपाड़ा.. इसके पीछे असली चमड़ी जैसी झुर्रीदार सिलवटें और पूरी लम्बाई में उभरी हुई नसें.. जिस भी कारीगर ने उसे बनाया था.. उसकी कला तारीफ़ के काबिल थी।
मुझे उस डिल्डो पर कुछ नमी सी महसूस हुई.. फिर मैंने उसे सूंघ कर देखा तो लड़कियों की चूत के रस की बास उसमें रची-बसी हुई थी।
मैंने खूब गहरी सांस लेकर वो महक अपने में भर ली, डिल्डो को वैसे ही लपेट कर अपनी जेब में रखा और वापिस चला आया।
उसी दिन दोपहर को मैं आरती के घर जा पहुँचा। संयोग से आरती घर पर अकेली थी.. मुझे देखकर वो पहले की ही तरह चहक उठी।
‘बड़े पापा आ गए..’ और खुश होकर पानी लेकर आई और मेरे पास बैठ कर बतियाने लगी। लेकिन आज मैं उसे एक नई नज़र से देख रहा था। उसके घने काले-काले लम्बे बाल.. गुलाबी रंगत लिए हुआ भोला सा गोल चेहरा। मेरी नज़र फिसलती हुई उसके सीने के उभारों पर ठहर गई.. दुपट्टा उसने ले नहीं रखा था। उसके कुर्ते में से अपनी उपस्थिति का आभास देते उसके वे अर्धविकसित अमृत कलश.. वो अविकसित स्तनों का जोड़ा मुझे लुभाने लगा।
फिर मेरी नज़र आरती से मिली.. उसने मेरी नज़रें शायद पढ़ लीं और अपने हाथ मोड़ कर सीने पर रख लिए और घबरा कर दूसरी तरफ देखने लगी।
लड़कियों में यह गुण जन्मजात होता है कि वो पुरुष की इस तरह की नज़रें तुरंत भांप लेती हैं.. पुरुष की नीयत को फौरन पढ़ लेती हैं।
‘आप बैठो बड़े पापा.. मैं चाय बना के लाती हूँ..’ आरती बोली और खड़ी हो गई।
शायद वो मेरी नज़रों से बचना चाह रही थी।
‘तेरे पापा कहाँ हैं.. आज उनसे तेरी शिकायत करना है.. जरा बुला के तो लाना उन्हें..’ मैंने थोड़ी कड़क आवाज में कहा।
‘पापा तो शहर गए हैं.. रात तक लौटेंगे.. मेरी क्या शिकायत करनी है.. ऐसा क्या कर दिया मैंने?’ वो भोलेपन से पूछ बैठी।
‘तुम कल दोपहर में कहाँ गई थी?’ मैंने पूछा..
मेरा प्रश्न सुनते ही आरती के चेहरे पर भय की परछाई तैर गई।
‘कहीं नहीं बड़े पापा.. मैं तो यहीं थी घर पर..’ वो झूठ बोल गई.. लेकिन उसकी आवाज़ कांप रही थी।
‘अब झूठ भी बोलने लगी तू.. मैंने तुझे कल तेरी सहेलियों के साथ बगीचे में वो गन्दा वाला खेल खेलते देखा है..’ मैंने कड़कती आवाज़ में कहा।
‘नहीं.. वो.. वो.. वो..!’ इसके आगे आरती कुछ न बोल पाई और उसकी आँखें झुक गईं।
तभी मैंने वो डिल्डो अपनी जेब से निकाल कर उसके सामने कर दिया।
‘यह तेरा है ना.. कल इसी से खेल रही थी न.. अपने भीतर घुसा कर?’ मैंने उसे डांटते हुए पूछा।
डिल्डो देख कर उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
दोस्तो, मुझे पूरी उम्मीद है कि आपको मेरी इस सत्य घटना से बेहद आनन्द मिला होगा.. एक कच्ची कली को रौंदने की घटना वास्तव में कामप्रेमियों के लिए एक चरम लक्ष्य होता है.. खैर.. दर्शन से अधिक मर्दन में सुख होता है.. इन्हीं शब्दों के साथ आज मैं आपसे विदा लेता हूँ.. अगली बार फिर जल्द ही मुलाक़ात होगी।


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28-01-2017, 08:37 AM
लण्ड न माने रीत -3
अब तक आपने पढ़ा..
‘अब झूठ भी बोलने लगी तू.. मैंने तुझे कल तेरी सहेलियों के साथ बगीचे में वो गन्दा वाला खेल खेलते देखा है..’ मैंने कड़कती आवाज़ में कहा।
‘नहीं.. वो..वो..वो..!’ इसके आगे आरती कुछ न बोल पाई और उसकी आँखें झुक गईं..
तभी मैंने वो डिल्डो अपनी जेब से निकाल कर उसके सामने कर दिया।
‘यह तेरा है ना.. कल इसी से खेल रही थी न.. अपने भीतर घुसा कर?’ मैंने उसे डांटते हुए पूछा।
डिल्डो देख कर उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

अब आगे..
‘मैंने नहीं लिया था भीतर..’ वो मरी सी आवाज़ में बोली और अपने हाथों में चेहरा छुपा कर रोने लगी।
‘ठीक है.. आने दे तेरे पापा को.. तेरा यह हथियार उन्हीं को दे दूँगा मैं.. और तू क्या-क्या करती है सहेलियों के साथ.. वो सब भी बताना पड़ेगा मुझे.’
मैंने उसे डराया.. यह सुनकर भय से कांपने लगी और मेरे पैरों पर गिर पड़ी।
‘मुझे माफ़ कर दो बड़े पापा.. अब मैं कोई गलत काम कभी नहीं करूँगी..’ वो रोते हुए बोली।
‘अरे करेगी कैसे नहीं.. अभी तू सिर्फ जवान हुई है.. और तेरी चूत में ज्वार-भाटा अभी से आने लगा.. तेरे बदन में जवानी की आग अभी से दहकने लगी?’

मैं कड़क आवाज में बोला और उसे पकड़ कर खड़ा कर दिया।
‘नहीं करूँगी बड़े पापा.. इस बार माफ़ कर दो..’ वो सुबकते हुए बोली।
‘तेरी यह चूत बहुत तंग करती है न.. तेरे को.. अब इसका इलाज मैं करूँगा..’ मैं गुस्से में बोला और आरती की सलवार के ऊपर से ही उसकी चूत अपनी मुट्ठी में भर लिया और उसकी झांटें खींचते हुए उसे धीरे-धीरे मसलने लगा।
वो कसमसा कर रह गई.. फिर मैंने उसके कुर्ते में शमीज़ के भीतर हाथ घुसा दिया और उसका नर्म मुलायम बायाँ स्तन दबोच लिया। वो परकटी हंसिनी सी निष्चेष्ट रह गई.. मेरा विरोध भी नहीं कर पा रही थी वो..
‘बोल.. अब क्या बोलती है?’ मैंने उसका दूध मसलते हुए पूछा।

‘बड़े पापा.. आप मेरी शिकायत मत करना.. वर्ना मैं मर जाऊँगी..’ वो अनुनय भरे स्वर में बोली।
‘ठीक है.. नहीं करूँगा.. लेकिन तुझे मेरी एक बात माननी पड़ेगी..’ मैं उससे बड़े प्यार से बोला।
‘कौन सी बात..’ वो डरते-डरते पूछने लगी।
‘अब इतनी भोली बन के भी मत दिखा.. सब समझ रही है तू..’ मैंने कहा और इस बार उसकी चड्डी में हाथ घुसा के उसकी नंगी चूत अपनी उंगलियों से कुरेदने लगा।
वो छिटक के दूर हट गई और एक तरफ खड़ी होकर सिर झुका कर पांव के अंगूठे से जमीन कुरेदने लगी..
मानो धरती से पूछ रही हो कि अब मैं क्या करूँ..
‘जल्दी बता मानेगी मेरी बात.. या तेरे पापा से बताऊँ तेरी करतूत?’ मेरी बात सुनकर उसने कातर दृष्टि से मुझे देखा लेकिन वो बोली कुछ नहीं पर सहमति में गर्दन हिला दी।
‘तो ठीक है.. कल दोपहर में अपने बगीचे में मिलना मुझे..’ मैंने उसे फिर से अपनी बाहों में समेट लिया और फिर से चड्डी में हाथ घुसा कर उसकी नंगी चूत सहलाते हुए बोला।
‘आऊँगी… बड़े पापा.. लेकिन आप वादा करो कि मेरी शिकायत किसी से भी कभी नहीं करोगे..’ वो बोली।
‘अरे नहीं करूँगा.. मेरी गुड़िया रानी.. पक्का वादा..’ मैं उसका गाल चूमते हुए बोला और उसकी चूत जोर से मुट्ठी में भींच ली।
‘उई.. आप बड़े ख़राब हो बड़े पापा..’ वो बोली और मेरा हाथ अपनी चड्डी से बाहर निकाल दिया, फिर दौड़ कर अन्दर वाले कमरे में भाग गई।
मैंने अपने उस हाथ को जोर से सूंघा और मैं अपनी धूर्तता पर मन ही मन प्रसन्न होता हुआ अपने घर की ओर चल दिया।
ट्रेन में सामान बेचते वेंडर्स बार-बार मेरी तन्द्रा भंग कर रहे थे.. पर मैं बार-बार अतीत की गहराइयों में डूब कर बिखरी हुई कड़ियों को जोड़ने की कोशिश कर रहा था.. आरती और मेरे बीच जो कुछ घट चुका था.. वो सब सोचते हुए ऐसा लग रहा था कि जैसे ये कल की ही बातें हों।
हाँ.. तो उस दिन मैंने आरती को तैयार कर लिया था और अगले दिन बगीचे में मिलने का वादा भी हो गया था.. वो रात बड़ी मुश्किल से कटी। आरती को कैसे चोदना है.. क्या-क्या कैसे कैसे करना है उसके साथ.. इन्हीं सब ख्यालों में डूबते-उतराते रात बीत गई।
अगले दिन मैं जल्दी तैयार हो गया.. अपनी झांटें साफ़ कर ली थीं और नहाने के बाद अपने सुपारे पर खूब सारा तेल चुपड़ कर उसे चमड़ी से ढक लिया था।

करीब ग्यारह बजे मैं बगीचे में पहुँच गया.. वो जून की गर्मी वाली दोपहर थी लू के थपेड़े शुरू हो रहे थे।
मैं आरती के इंतज़ार में एक पेड़ पर चढ़ कर बैठ गया। लगभग एक घंटे बाद वो आती दिखाई दी.. उसने अपने सिर और मुँह पर दुपट्टा लपेट रखा था और तेज़-तेज़ क़दमों से चली आ रही थी।
जैसे ही वो बगीचे में दाखिल हुई.. मैं पेड़ से उतर उसके सामने पहुँच गया.. उसने मुझे देखा और फिर नीचे देखने लगी।
मैं आगे बढ़ा और उसे कलाई से पकड़ अपनी छाती से चिपका लिया।
‘क्यों बुलाया मुझे यहाँ पर?’ वो मुझसे छूटने का यत्न करते हुए बोली।
‘अब इतनी भोली भी मत बनो गुड़िया रानी.. कल तुम डिल्डो से खेल रही थीं। आज मैं तुम्हे तुम्हारी चूत को असली वाला लण्ड दूँगा।’ मैंने आरती का गाल चूमते हुए कहा।

‘धत्त.. बड़े पापा कैसे गंदे-गंदे शब्द बोलते हो आप तो..’ वो अपने दोनों हाथ कानों पर रखते हुए बोली।
बगीचे में एक झोपड़ी बनी हुई थी.. मैंने आरती से उसी झोपड़ी में चलने को कहा। लेकिन उसने मना कर दिया.. बोली- वहाँ कभी भी कोई आ सकता है.. इससे अच्छा आम के पेड़ पर चलते हैं.. वहाँ एक मचान बनी है.. जो नीचे से दिखाई नहीं पड़ती।
उसकी समझदारी की मैंने मन ही मन तारीफ़ की और हम लोग उस घने आम के पेड़ पर चढ़ गए।
गाँव की लड़किया। पेड़ पर चढ़ने में एक्सपर्ट होती हैं.. सो वो भी फुर्ती से मेरे पहले मचान पर पहुँच गई।
मचान दो समतल डालियों के ऊपर लकड़ी के पटिये बिछा कर बनी थी.. उस पर नर्म बिस्तर लगा था। जगह शानदार लगी मुझे.. ऊपर घने पत्तों के साथ हरे हरे कच्चे आम लटक रहे थे.. तोतों के कुछ झुण्ड आमों को कुतर रहे थे.. बीच-बीच में उनके टांय-टांय बोलने की आवाजें भी आ रही थीं।

घनी डालियों और पत्तों से घिरी वो जगह नीचे से बिल्कुल नहीं दिखाई पड़ती थी और वहाँ गर्मी भी न के बराबर थी.. या यूँ कहो कि कुल मिलाकर मस्त सुहानी जगह थी।
आरती मचान के एक कोने में बैठ गई उसने अपने पैर मोड़ कर सीने से लगा रखे थे और ऊपर से बाहें लपेट ली थीं।
मैं उसके सामने बैठ उसे मुस्करा कर देखने लगा।
मुझसे नज़र मिलीं तो उसने शर्मा कर अपना मुँह घुटनों में छुपा लिया।
मैंने उसकी कलाई पकड़ कर उसे अपनी गोद में गिरा लिया और उसके गालों को चूमने लगा।
‘छोड़ो बड़े पापा.. लाज आती है.. मत करो ऐसे..’ आरती बोली और अपना चेहरा हथेलियों में छुपाने लगी।
लेकिन मैंने उसे ऐसा नहीं करने दिया और उसका निचला होंठ अपने होंठों में दबा के चूसने लगा और उसकी कुर्ती के ऊपर से ही उसके दूध सहलाने लगा।

उसने कुर्ती के नीचे शमीज़ नहीं पहनी हुई थी, इस कारण उसके छोटे-छोटे स्तनों का नर्म-गर्म स्पर्श बड़ा उत्तेजक महसूस हो रहा था। उसके कुंवारे अधरों का रसपान जी भर के करने के बाद मैंने उसके कान की लौ और गर्दन को सब ओर से चूमना शुरू किया और धीरे-धीरे उसकी पीठ पर उंगलियाँ फिराना शुरू कीं।
जैसा कि होना ही था.. वो भी धीरे-धीरे सुलगने लगी और उसने अपने बदन को ढीला छोड़ दिया। अब मैंने उसके नितम्बों को धीरे-धीरे सहलाने लगा था।

मेरे हाथ उसके नितम्बों और गुदाज़ जाँघों का जाएजा ले रहे थे.. कमसिन कच्ची कली के जिस्म का उष्ण स्पर्श कितना मादक कितना रोमांचकारी होता है.. यह उस दिन पहली बार अनुभव हो रहा था।
मैंने आरती को कस कर अपनी बाहों में समेट लिया और आँखें मूँद कर उन पलों का आनन्द लेने लगा।
उसके फूल से कोमल स्तन मेरे सीने से दबे हुए थे और मैं धीरे-धीरे उसकी गर्दन को चूम-चाट रहा था। उसके दिल की धक.. धक.. मुझे अपने सीने पर साफ़ सुनाई पड़ रही थी।

जब मेरा हाथ उसकी जाँघों पर से फिसलते हुए योनि प्रदेश की ओर बढ़ चला तो उसने अपनी जांघें कस कर भींच लीं और मेरा हाथ वहीं फंस कर रह गया।
दोस्तो, मुझे पूरी उम्मीद है कि आपको मेरी इस सत्य घटना से बेहद आनन्द मिला होगा.. एक कच्ची कली को रौंदने की घटना वास्तव में कामप्रेमियों के लिए एक चरम लक्ष्य होता है.. खैर.. दर्शन से अधिक मर्दन में सुख होता है..
इन्हीं शब्दों के साथ आज मैं आपसे विदा लेता हूँ.. अगली बार फिर जल्द ही मुलाक़ात होगी।


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28-01-2017, 11:44 PM (This post was last modified: 28-01-2017, 11:45 PM by arav1284.)
 बहुत ही कामुक अपडेट ...अगले अपडेट का इंतज़ार रहेगा..
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