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Desi मेरी प्रियतमा रश्मी

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Desi मेरी प्रियतमा रश्मी
rajbr1981 Online
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#1
02-11-2014, 12:59 AM (This post was last modified: 02-11-2014, 01:02 AM by rajbr1981.)
मेरी प्रियतमा रश्मी
उसका पूरा नाम तो था रश्मी पटेल पर स्कूल में उसे सभी घरवाले रम्मी या रमो कहते थे पर मेरी बाहों में तो वो सदा सिमसिम या निक्कुड़ी ही बनी रही थी। एक नटखट, नाज़ुक, चुलबुली और नादान कलि मेरे हाथों के खुरदरे स्पर्श और तपिश में डूब कर फूल बन गई और और अपनी खुशबूओं को फिजा में बिखेर कर किसी हसीन फरेब (छलावे) के मानिंद सदा सदा के लिए मेरी आँखों से ओझल हो गई। मेरे दिल का हरेक कतरा तो आज भी फिजा में बिखरी उन खुशबूओं को तलाश रहा है......




rajbr1981 के दिल से ...
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rajbr1981 Online
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#2
02-11-2014, 01:00 AM (This post was last modified: 02-11-2014, 02:06 AM by rajbr1981.)
मेरे प्रिय पाठको और पाठिकाओ,

आप सभी ने मेरी पिछली सभी कहानियों को बहुत पसंद किया है उसके लिए मैं आप सभी का आभारी हूँ। मैंने सदैव अपनी कहानियों के माध्यम से अपने पाठकों को अच्छे मनोरंजन के साथ साथ उपयोगी जानकारी भी देने की कोशिश की है। मेरी बहुत सी पाठिकाएं मुझे अक्सर पूछती रहती हैं कि मैं इतनी दुखांत, ग़मगीन और भावुक कहानियां क्यों लिखता हूँ। विशेषरूप से सभी ने मिक्की (दो नम्बर का बदमाश ) के बारे में अवश्य पूछा है कि क्या यह सत्यकथा है? मैं आज उसका जवाब दे रहा हूँ। मैं आज पहली बार आपको अपनी प्रियतमा रश्मी के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसके बारे में मैंने आज तक किसी को नहीं बताया। यह कहानी मेरी प्रेयसी को एक श्रद्धांजलि है जिसकी याद में मैंने आज तक इतनी कहानियां लिखी हैं। आपको यह कहानी कैसी लगी मुझे अवश्य अवगत करवाएं।

काश यह जिन्दगी किसी फिल्म की रील होती तो मैं फिर से उसे उल्टा घुमा कर आज से 14 वर्ष पूर्व के दिनों में ले जाता। आप सोच रहे होंगे 14 साल पहले ऐसा क्या हुआ था कि आज बैठे बिठाए उसकी याद आ गई? हाँ मेरी पाठिकाओ बात ही ऐसी है:

आप तो जानते हैं कोई भी अपने पहले प्रेम और कॉलेज या हाई स्कूल के दिनों को नहीं भूल पाता, मैं भला अपनी रश्मी, अपनी निक्कुड़ी और खुल जा सिमसिम को कैसे भूल सकता हूँ। आप खुल जा सिमसिम और निक्कुड़ी नाम सुन कर जरूर चौंक गए होंगे। आपको यह नाम अजीब सा लगा ना ? हाँ मेरी पाठिकाओं आज मैं अपनी खुल जा सिमसिम के बारे में ही बताने जा रहा हूँ जिसे स्कूल के सभी लड़के और प्रोफ़ेसर केटी और घरवाले रमो या रम्मी कह कर बुलाते थे पर मेरी बाहों में तो वो सदा सिमसिम या निक्कुड़ी ही बन कर समाई रही थी।

स्कूल या कॉलेज में अक्सर कई लड़के लड़कियों और मास्टरों के अजीब से उपनाम रख दिए जाते हैं जैसे हमने उस केमेस्ट्री के प्रोफ़ेसर का नाम "चिड़ीमार" रख दिया था। उसका असली नाम तो शीतला प्रसाद बिन्दियार था पर हम सभी पीठ पीछे उसे चिड़ीमार ही कहते थे। था भी तो साढ़े चार फुटा ही ना। सैंट पॉल स्कूल में रसायन शास्त्र (केमेस्ट्री) पढ़ाता था। मुझे उस दिन मीथेन का सूत्र याद नहीं आया और मैंने गलती से CH4 की जगह CH2 बता दिया ? बस इतनी सी बात पर उसने पूरी क्लास के सामने मुझे मरुस्थल का ऊँट (मकाऊ-केमल) कह दिया। भला यह भी कोई बात हुई। गलती तो किसी से भी हो सकती है। इसमें किसी को यह कहना कि तुम्हारी अक्ल घास चरने चली गई है सरासर नाइंसाफी है ना ? अब मैं भुनभुनाऊँ नहीं तो और क्या करूँ ?

बात उन दिनों की है जब मैं +2 में पढता था। मुझे केमेस्ट्री के सूत्र याद नहीं रहते थे। सच पूछो तो यह विषय ही मुझे बड़ा नीरस लगता था। पर बापू कहता था कि बिना साइंस पढ़े इन्जीनियर कैसे बनोगे। इसलिए मुझे अप्रैल में नया सत्र शुरू होते ही केमेस्ट्री की ट्यूशन इसी प्रोफ़ेसर चिड़ीमार के पास रखनी पड़ी थी और स्कूल के बाद इसके घर पर ही ट्यूशन पढ़ने जाता था। इसे ज्यादा कुछ आता जाता तो नहीं पर सुना था कि यह Ph.D किया हुआ है। साले ने जरूर बिहार से कोई फर्जी डिग्री मार ली होगी या फिर हमारे मोहल्ले वाले घासीराम हलवाई की तरह ही इसने भी Ph.D की होगी (पास्ड हाई स्कूल विद डिफिकल्टी)।

दरअसल मेरे ट्यूशन रखने का एक और कारण भी था। सच कहता हूँ साले इस चिड़ीमार की बीवी बड़ी खूबसूरत थी। किस्मत का धनी था जो ऐसी पटाखा चीज मिली थी इस चूतिये को। यह तो उसके सामने चिड़ीमार ही लगता था। वो तो पूरी क़यामत लगती थी जैसे करीना कपूर ही हो। कभी कभी घर पर उसके दर्शन हो जाते थे। जब वो अपने नितम्ब लचका कर चलती तो मैं तो बस देखता ही रह जाता। जब कभी उस चिड़ीमार के लिए चाय-पानी लेकर आती और नीचे होकर मेज पर कोई चीज रखती तो उसकी चुंचियां देख कर तो मैं निहाल ही हो जाता था। क्या मस्त स्तन थे साली के- मोटे मोटे रस भरे। जी तो करता था कि किसी दिन पकड़ कर दबा ही दूं। पर डरता था मास्टर मुझे स्कूल से ही निकलवा देगा। पर उसके नाम की मुट्ठ लगाने से मुझे कोई भला कैसे रोक सकता था। मैं कभी कभी उसके नाम की मुट्ठ लगा ही लिया करता था।

मेरी किस्मत अच्छी थी 5-7 दिनों से एक और लड़की ट्यूशन पर आने लगी थी। वैसे तो हमने 10वीं और +1 भी साथ साथ ही की थी पर मेरी ज्यादा जान पहचान नहीं थी। वो भी मेरी तरह ही इस विषय में कमजोर थी। नाम था रश्मी पटेल पर घरवाले उसे रम्मी या निक्कुड़ी ही बुलाते थे। वो सिर पर काली टोपी और हाथ में लाल रंग का रुमाल रखती थी सो साथ पढ़नेवाले सभी उसे केटी (काली टोपी) ही कहते थे। केटी हो या निक्कुड़ी क्या फर्क पड़ता है लौंडिया पूरी क़यामत लगती थी। नाम से तो गुजराती लगती थी पर बाद में पता चला कि उसका बाप गुजराती था पर माँ पंजाबी थी। दोनों ने प्रेम विवाह किया था और आप तो जानते ही हैं कि प्रेम की औलाद वैसे भी बड़ी खूबसूरत और नटखट होती है तो भला रश्मी क्यों ना होती।

लगता था भगवान् ने उसे फुर्सत में ही तराश कर यहाँ भेजा होगा। चुलबुली, नटखट, उछलती और फुदकती तो जैसे सोनचिड़ी ही लगती थी। तीखे नैन-नक्श, मोटी मोटी बिल्लोरी आँखें, गोरा रंग, लम्बा कद, छछहरा बदन और सिर के बाल कन्धों तक कटे हुए। बालों की एक आवारा लट उसके कपोलों को हमेंशा चूमती रहती थी। कभी कभी जब वो धूप से बचने आँखों पर काला चश्मा लगा लेती थी तो उसकी खूबसूरती देख कर लड़के तो अपने होश-ओ-हवास ही खो बैठते थे। मेरा दावा है कि अगर कोई रिंद(नशेड़ी) इन आँखों को देख ले तो मयखाने का रास्ता ही भूल जाए। स्पोर्ट्स शूज पहने, कानों में सोने की छोटी छोटी बालियाँ पहने पूरी सानिया मिर्ज़ा ही लगती थी। सबसे कमाल की चीज तो उसके नितम्ब थे मोटे मोटे कसे हुए गोल मटोल। आमतौर पर गुजराती लड़कियों के नितम्ब और बूब्स इतने मोटे और खूबसूरत नहीं होते पर इसने तो कुछ गुण तो अपनी पंजाबी माँ से भी तो लिए होंगे ना। उसकी जांघें तो बस केले के पेड़ की तरह चिकनी, मखमली, रोमविहीन और भरी हुई आपस में रगड़ खाती कहर बरपाने वाली ही लगती थी। अगर किसी का लंड इनके बीच में आ जाए तो बस पिस ही जाए। आप सोच रहे होंगे कि मुझे उसकी जाँघों के बारे में इतना कैसे पता ?
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#3
02-11-2014, 11:00 AM
nice knowledge of all buddy!
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rajbr1981 Online
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#4
08-11-2014, 01:31 AM
मैं समझाता हूँ। ट्यूशन के समय वो मेरे साथ ही तो बैठती थी। कई बार अनजाने में उसकी स्कर्ट ऊपर हो जाती तो सफ़ेद रंग की पैंटी साफ़ नज़र आ जाती है। और उसकी कहर ढाती गोरी गोरी रोमविहीन कोमल जांघें और पिंडलियाँ तो बिजलियाँ ही गिरा देती थी। पैंटी में मुश्किल से ढकी उसकी छोटी सी बुर तो बेचारी कसमसाती सी नज़र आती थी। उसकी फांकों का भूगोल तो उस छोटी सी पैंटी में साफ़ दिखाई देता था। कभी कभी जब वो एक पैर ऊपर उठा कर अपने जूतों के फीते बांधती थी तो उसकी बुर का कटाव देख कर तो मैं बेहोश होते होते बचता था। मैं तो बस इसी ताक में रहता था कि कब वो अपनी टांग को थोड़ा सा ऊपर करे और मैं उस जन्नत के नज़ारे को देख लूं। प्रसिद्द गीतकार एन. वी. कृष्णन ने एक पुरानी फिल्म चिराग में आशा पारेख की आँखों के लिए एक गीत लिखा था। मेरा दावा है अगर वो रश्मी की इन पुष्ट, कमसिन और रोमविहीन जाँघों को देख लेता तो यह शेर लिखने को मजबूर हो जाता :

तेरी जाँघों के सिवा

दुनिया में रखा क्या है

आप सोच रहे होंगे यार क्या बकवास कर रहे हो- 18 साल की छोकरी केवल पैंटी ही क्यों पहनेगी भला ? क्या ऊपर पैंट या पजामा नहीं डालती ?

ओह ! मैं बताना भूल गया ? रश्मी मेरी तरह लॉन टेनिस की बहुत अच्छी खिलाड़ी थी। ट्यूशन के बाद वो सीधे टेनिस खेलने जाती थी इस वजह से वो पैंट नहीं पहनती थी, स्कर्ट के नीचे केवल छोटी सी पैंटी ही पहनती थी जैसे सानिया मिर्ज़ा पहनती है। शुरू शुरू में तो उसने मुझे कोई भाव नहीं दिया। वो भी मुझे कई बार मज़ाक में मकाऊ (मरुस्थल का ऊँट) कह दिया करती थी। और कई बार तो जब कोई सूत्र याद नहीं आता था तो इस चिड़ीमार की देखा देखी वो भी अपनी तर्जनी अंगुली अपनी कनपटी पर रख कर घुमाती जिसका मतलब होता कि मेरी अक्ल घास चरने चली गई है। मैं भी उसे सोनचिड़ी या खुल जा सिमसिम कह कर बुला लिया करता था वो बुरा नहीं मानती थी।

मैं भी टेनिस बड़ा अच्छा खेल लेता हूँ। आप सोच रहे होंगे यार प्रेम क्यों फेंक रहे हो ? ओह ... मैं सच बोल रहा हूँ 2-3 साल पहले हमारे घर के पास एक सरकारी अधिकारी रहने आया था। उसे टेनिस का बड़ा शौक था। वो मुझे कई बार टेनिस खेलने ले जाया करता था। धीरे धीरे मैं भी इस खेल में उस्ताद बन गया। रश्मी तो कमाल का खेलती ही थी।

ट्यूशन के बाद अक्सर हम दोनों सहेलियों की बाड़ी के पास बने कलावती खेल प्रांगण में बने टेनिस कोर्ट में खेलने चले जाया करते थे। जब भी वो कोई ऊंचा शॉट लगाती तो उसकी पुष्ट जांघें ऊपर तक नुमाया हो जाती। और उसके स्तन तो जैसे शर्ट से बाहर निकलने को बेताब ही रहते थे। वो तो उस शॉट के साथ ऐसे उछलते थे जैसे कि बैट पर लगने के बाद बाल उछलती है। गोल गोल भारी भारी उठान और उभार से भरपूर सीधे तने हुए ऐसे लगते थे जैसे दबाने के लिए निमंत्रण ही दे रहे हों।

गेम पूरा हो जाने के बाद हम दोनों ही पसीने से तर हो जाया करते थे। उसकी बगल तो नीम गीली ही हो जाती थी और उसकी पैंटी का हाल तो बस पूछो ही मत। मैं तो बस किसी तरह उसकी छोटी सी पैंटी के बीच में फंसी उसकी मुलायम सी बुर (अरे नहीं यार पिक्की) को देखने के लिए जैसे बेताब ही रहता था। हालांकि मैं टेनिस का बहुत अच्छा खिलाड़ी था पर कई बार मैं उसकी पुष्ट और मखमली जाँघों को देखने के चक्कर में हार जाया करता था। और जब मैं हार जाता था तो वो ख़ुशी के मारे जब उछलती हुई किलकारियाँ मारती थी तो मुझे लगता था कि मैं हार कर भी जीत गया।

3-4 गेम खेलने के बाद हम दोनों घर आ जाया करते थे। मेरे पास बाइक थी। वो पीछे बैठ जाया करती थी और मैं उसे घर तक छोड़ दिया करता था। पहले पहले तो वो मेरे पीछे जरा हट कर बैठती थी पर अब तो वो मुझसे इस कदर चिपक कर बैठने लगी थी कि मैं उसके पसीने से भीगे बदन की मादक महक और रेशमी छुअन से मदहोश ही हो जाता था। कई बार तो वो जब मेरी कमर में हाथ डाल कर बैठती थी तो मेरा प्यारेलाल तो (लंड) आसमान ही छूने लग जाता था और मुझे लगता कि मैं एक्सिडेंट ही कर बैठूँगा। आप तो जानते ही हैं कि जवान औरत या लड़की के बदन से निकले पसीने की खुशबू कितनी मादक और मदहोश कर देने वाली होती है और फिर यह तो जैसे हुस्न की मल्लिका ही थी। जब वो मोटर साइकिल से उतर कर घर जाती तो अपनी कमर और नितम्ब इस कदर मटका कर चलती थी जैसे कोई बल खाती हसीना रैम्प पर चल रही हो। उसके जाने के बाद मैं मोटर साइकिल की सीट पर उस जगह को गौर से देखता जहां ठीक उसके नितम्ब लगते थे या उसकी पिक्की होती थी। उस जगह का गीलापन तो जैसे मेरे प्यारेलाल को आवारालाल ही कर देता था। कई बार तो मैंने उस गीली जगह पर अपनी जीभ भी लगा कर देखी थी। आह... क्या मादक महक आती है साली की बुर के रस से ......

कई बार तो वो जब ज्यादा खुश होती थी तो रास्ते में इतनी चुलबुली हो जाती थी कि पीछे बैठी मेरे कानों को मुंह में लेकर काट लेती थी और जानबूझ कर अपनी नुकीली चुंचियां मेरी पीठ पर रगड़ देती थी। और फिर तो घर आ कर मुझे उसके नाम की मुट्ठ मारनी पड़ती थी। पहले मैं उस चिड़ीमार की बीवी के नाम की मुट्ठ मारता था अब एक नाम सोनचिड़ी (रश्मी) का भी शामिल हो गया था।

मुझे लगता था कि वो भी कुछ कुछ मुझे चाहने लगी थी। हे भगवान ! अगर यह सोनचिड़ी किसी तरह फंस जाए तो मैं तो बस सीधे बैकुंठ ही पहुँच जाऊं। ओह कुछ समझ ही नहीं आ रहा ? समय पर मेरी बुद्धि काम ही नहीं करती ? कई बार तो मुझे शक होता है कि मैं वाकई ऊँट ही हूँ। ओह हाँ याद आया लिंग महादेव बिलकुल सही रहेगा। थोड़ा दूर तो है पर चलो कोई बात नहीं इस सोनचिड़ी के लिए दूरी क्या मायने रखती है। चलो हे लिंग महादेव ! अगर यह सोनचिड़ी किसी तरह मेरे जाल में फस जाए तो मैं आने वाले सावन में देसी गुड़ का सवा किलो चूरमा तुम्हें जरूर चढाऊंगा। (माफ़ करना महादेवजी यार चीनी बहुत महंगी है आजकल)

ओह मैं भी कैसी फजूल बातें करने लगा। मैं उसकी बुर के रस और मखमली जाँघों की बात कर रहा था। उसकी गुलाबी जाँघों को देख कर यह अंदाजा लगाना कत्तई मुश्किल नहीं था कि बुर की फांकें भी जरूर मोटी मोटी और गुलाबी रंग की ही होंगी। मैंने कई बार उसके ढीले टॉप के अन्दर से उसकी बगलों (कांख) के बाल देखे थे। आह... क्या हलके हलके मुलायम और रेशमी रोयें थे। मैं यह सोच कर तो झड़ते झड़ते बचता था कि अगर बगलों के बाल इतने खूबसूरत हैं तो नीचे का क्या हाल होगा। मेरा प्यारेलाल तो इस ख़याल से ही उछलने लगता था कि उसकी बुर पर उगे बाल कैसे होंगे। मेरा अंदाजा है कि उसने अपनी झांटें बनानी शुरू ही नहीं की होगी और रेशमी, नर्म, मुलायम और घुंघराले झांटों के बीच उसकी बुर तो ऐसे लगती होगी जैसे घास के बीच गुलाब का ताज़ा खिला फूल अपनी खुशबू बिखेर रहा हो।

उस दिन रश्मी कुछ उदास सी नज़र आ रही थी। आज हम दोनों का ही ट्यूशन पर जाने का मूड नहीं था। हम सीधे ही टेनिस कोर्ट पहुँच गए। आज उसने आइसक्रीम की शर्त लगाई थी कि जो भी जीतेगा उसे आइसक्रीम खिलानी होगी। मैं सोच रहा था मेरी जान मैं तो तुम्हें आइसक्रीम क्या और भी बहुत कुछ खिला सकता हूँ तुम एक बार हुक्म करके तो देखो।
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#5
09-11-2014, 10:31 PM
और फिर उस दिन हालांकि मैंने अपना पूरा दम ख़म लगाया था पर वो ही जीत गई। उसके चहरे की रंगत और आँखों से छलकती ख़ुशी मैं कैसे नहीं पहचानता। उसने पहले तो अपने सिर से उस काली टोपी को उतारा और दूसरे हाथ में वही लाल रुमाल लेकर दोनों हाथ ऊपर उठाये और नीचे झुकी तो उसके मोटे मोटे संतरे देख कर तो मुझे जैसे मुंह मांगी मुराद ही मिल गई। वाह ... क्या गोल गोल रस भरे संतरे जैसे स्तन थे। एरोला तो जरूर एक रुपये के सिक्के जितना ही था लाल सुर्ख। और उसके चुचूक तो जैसे चने के दाने जितनी बिलकुल गुलाबी। बीच की घाटी तो जैसे क़यामत ही ढा रही थी। मुझे तो लगा कि मेरा प्यारेलाल तो यह नज़ारा देख कर ख़ुदकुशी ही कर बैठेगा।

हमनें रास्ते में आइसक्रीम खाई और घर की ओर चल पड़े। आमतौर पर वो सारे रास्ते मेरे कान खाती रहती है एक मिनट भी वो चुप नहीं रह सकती। पर पता नहीं आज क्यों उसने रास्ते में कोई बात नहीं की। मुझे इस बात की बड़ी हैरानी थी कि आज वो मेरे साथ चिपक कर भी नहीं बैठी थी वर्ना तो जिस दिन वो जीत जाती थी उस दिन तो उसका चुलबुलापन देखने लायक होता था। जब वह मोटर साइकिल से उतर कर अपने घर की ओर जाने लगी तो उसने पूछा, "प्रेम एक बात सच सच बताना ?"

क्या ?"

"आज तुम जानबूझ कर हारे थे ना ?"

"न ... न ... नहीं तो ?"

"मैं जानती हूँ तुम झूठ बोल रहे हो ?"

"ओह ... ?"

"बोलो ना ?"

"स ... स ... सिमरम ... मैं आज के दिन तुम्हें हारते हुए क ...क ... कैसे देख सकता था यार ?" मेरी आवाज़ जैसे काँप रही थी। इस समय तो मैं शाहरुख़ कहाँ का बाप ही लग रहा था।

"क्या मतलब ?"

"मैं जानता हूँ कि आज तुम्हारा जन्मदिन है !"

"ओह ... अरे ... तुम्हें कैसे पता ?" उसने अपनी आँखें नचाई।

"वो वो... दरअसल स ... स ... सिम ... सिम ... मैं ?" मेरा तो गला ही सूख रहा था कुछ बोल ही नहीं पा रहा था।

रश्मी खिलखिला कर हंस पड़ी। हंसते हुए उसके मोती जैसे दांत देख कर तो मैं सोचने लगा कि इस सोनचिड़ी का नाम दयमंती या चंद्रावल ही रख दूं।

"रश्मी तुम्हें जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई हो !"

"ओह, आभार तमारो, मारा प्रेम" (ओह... थैंक्स मेरे प्रेम) वो पता नहीं क्या सोच रही थी।

कभी कभी वो जब बहुत खुश होती थी तो मेरे साथ गुजराती में भी बतिया लेती थी। पर आज जिस अंदाज़ में उसने ‘मारा प्रेम’ (मेरे प्रेम) कहा था मैं तो इस जुमले का मतलब कई दिनों तक सोच सोच कर ही रोमांचित होता रहा था।

वो कुछ देर ऐसे ही खड़ी सोचती रही और फिर वो हो गया जिसकि कल्पना तो मैंने सपने में भी नहीं की थी। एक एक वो मेरे पास आई और और इससे पहले कि मैं कुछ समझता उसने मेरा सिर पकड़ कर अपनी ओर करते हुए मेरे होंठों को चूम लिया। मैंने तो कभी ख्वाब-ओ-खयालों में भी इसका गुमान नहीं किया था कि वो ऐसा करेगी। मुझे तो अपनी किस्मत पर यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतनी जल्दी यह सब हो जाएगा।

आह ... उस एक चुम्बन की लज्जत को तो मैं मरते दम तक नहीं भूलूंगा। क्या खुशबूदार मीठा अहसास था। उसके नर्म नाज़ुक होंठ तो जैसे शहद भरी दो पंखुड़ियां ही थी। आज भी जब मैं उन लम्हों को कभी याद करता हूँ तो बरबस मेरी अंगुलियाँ अपने होंठों पर आ जाती है और मैं घंटों तक उस हसीन फरेब को याद करता रहता हूँ।

रश्मी बिना मेरी ओर देखे अन्दर भाग गई। मैं कितनी देर वहाँ खड़ा रहा मुझे नहीं पता। अचानक मैंने देखा कि रश्मी अपने घर की छत पर खड़ी मेरी ओर ही देख रही है। जब मेरी नज़रें उससे मिली तो उसने उसी पुराने अंदाज़ में अपने दाहिने हाथ की तर्ज़नी अंगुली अपनी कनपटी पर लगा कर घुमाई जिसका मतलब मैं, रश्मी और अब तो आप सब भी जान ही गए हैं। पुरुष अपने आपको कितना भी बड़ा धुरंधर क्यों ना समझे पर नारी जाति के मन की थाह और मन में छिपी भावनाओं को कहाँ समझ पाता है। बरबस मेरे होंठों पर पुरानी फिल्म गुमनाम में मोहम्मद रफ़ी का गया एक गीत निकल पड़ा :

एक लड़की है जिसने जीना मुश्किल कर दिया

वो तुम्हीं हो वो नाजनीन वो तुम्हीं हो वो महज़बीं ...

गीत गुनगुनाते हुए जब मैं घर की ओर चला तो मुझे इस बात की बड़ी हैरानी थी कि रश्मी ने मुझे अपने जन्मदिन पर क्यों नहीं बुलाया? खैर जन्मदिन पर बुलाये या ना बुलाये उसके मन में मेरे लिए कोमल भावनाएं और प्रेम का बिरवा तो फूट ही पड़ा है। उस रात मैं ठीक से सो नहीं पाया। सारी रात बस रोमांच और सपनीली दुनिया में गोते ही लगाता रहा। मुझे तो लगा जैसे मेरे दिल की हर धड़कन उसका ही नाम ले रही हैं, मेरी हर सांस में उसी का अहसास गूँज रहा है मेरी आँखों में वो तो रच बस ही गई है। मेरा जी तो कर रहा था कि मैं बस पुकारता ही चला जाऊं....

मेरी रश्मी .... मेरी सिमसिम ......

अगले चार दिन मैं ना तो स्कूल जा पाया और ना ही ट्यूशन पर। मुझे बुखार हो गया था। मुझे अपने आप पर और इस बुखार पर गुस्सा तो बड़ा आ रहा था पर क्या करता ? बड़ी मुश्किल से यह फुलझड़ी मेरे हाथों में आने को हुई है और ऐसे समय पर मैं खुद उस से नहीं मिल पा रहा हूँ। मैं ही जानता हूँ मैंने ये पिछले तीन दिन कैसे बिताये हैं।

काश ! कुछ ऐसा हो कि रश्मी खुद चल कर मेरे पास आ जाए और मेरी बाहों में समा जाए। बस किसी समंदर का किनारा हो या किसी झील के किनारे पर कोई सूनी सी हवेली हो जहां और दूसरा कोई ना हो। बस मैं और मेरी नाज़नीन रश्मी ही हों और एक दूसरे की बाहों में लिपटे गुटर गूं करते रहें क़यामत आने तक। काश ! इस शहर को ही आग लग जाए बस मैं और रश्मी ही बचे रहें। काश कोई जलजला (भूकंप) ही आ जाए। ओह लिंग महादेव ! तू ही कुछ तो कर दे यार मेरी रमो को मुझ से मिला दे ? मैं उसके बिना अब नहीं रह सकता।

उस एक चुम्बन के बाद तो मेरी चाहत जैसे बदल ही गई थी। मैं इतना बेचैन तो कभी नहीं रहा। मैंने सुना था और फिल्मों में भी देखा था कि आशिक अपनी महबूबा के लिए कितना तड़फते हैं। आज मैं इस सच से रूबरू हुआ था। मुझे तो लगने लगने लगा कि मैं सचमुच इस नादान नटखट सोनचिड़ी से प्रेम करने लगा हूँ। पहले तो मैं बस किसी भी तरह उसे चोद लेना चाहता था पर अब मुझे लगता था कि इस शरीर की आवश्यकता के अलावा भी कुछ कुनमुना रहा है मेरे भीतर। क्या इसी को प्रेम कहते हैं ?

चुम्बन प्रेम का प्यारा सहचर है। चुम्बन हृदय स्पंदन का मौन सन्देश है और प्रेम गुंजन का लहराता हुआ कम्पन है। प्रेमाग्नि का ताप और दो हृदयों के मिलन की छाप है। यह तो नव जीवन का प्रारम्भ है। ओह... मेरे प्रेम के प्रथम चुम्बन मैं तुम्हें अपने हृदय में छुपा कर रखूँगा और अपने स्मृति मंदिर में मूर्ति बना कर स्थापित करूंगा। यही एक चुम्बन मेरे जीवन का अवलंबन होगा।

जिस तरीके से रश्मी ने चुम्बन लिया था और शर्मा कर भाग गई थी मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि उसके मन में भी मेरे लिए कोमल भावनाएं जरूर आ गई हैं जिन्हें चाहत का नाम दिया जा सकता है। उस दिन के बाद तो उसका चुलबुलापन, शौखियाँ, अल्हड़पन और नादानी पता नहीं कहाँ गायब ही हो गई थी। ओह ... अब मुझे अपनी अक्ल के घास चरने जाने का कोई गम नहीं था।

शाम के कोई चार बजे रहे थे मैंने दवाई ले ली थी और अब कुछ राहत महसूस कर रहा था। इतने में शांति बाई (हमारी नौकरानी) ने आकर बताया कि कोई लड़की मिलने आई है। मेरा दिल जोर से धड़का। हे लिंग महादेव ! यार मेरे ऊपर तरस खा कर कहीं रश्मी को ही तो नहीं भेज दिया ?
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#7
16-11-2014, 12:54 AM
"हल्लो, केम छो, प्रेम ?" (हेल्लो कैसे हो प्रेम?) जैसे अमराई में कोई कोयल कूकी हो, किसी ने जल तरंग छेड़ी हो या फिर वीणा के सारे तार किसी ने एक साथ झनझना दिए हों। एक मीठी सी आवाज ने मेरा ध्यान खींचा। ओह.... यह तो सचमुच मेरी सोनचिड़ी ही तो थी। मुझे तो अपनी किस्मत पर यकीन ही नहीं हो रहा था कि रश्मी मेरे घर आएगी। गुलाबी रंग के पटयालवी सूट में तो आज उसकी ख़ूबसूरती देखते ही बनती थी पूरी पंजाबी मुटियार (अप्सरा) ही लग रही थी। आज सिर पर वो काली टोपी नहीं थी पर हाथ में वही लाल रुमाल और मुंह में चुइंगम।

"म ... म ... मैं ... ठीक हूँ। तुम ओह... प्लीज बैठो ... ओह... शांति बाई ...ओह..." मैंने खड़ा होने की कोशिश की। मुझे तो उसकी ख़ूबसूरती को देख कर कुछ सूझ ही नहीं रहा था।

"ओह लेटे रहो ? क्या हुआ है ? मुझे तो प्रोफ़ेसर साहब से पता चला कि तुम बीमार हो तो मैंने तुम्हारा पता लेने चली आई।"

वह पास रखी स्टूल पर बैठ गई। उसने अपने रुमाल के बीच में रखा एक ताज़ा गुलाब का फूल निकाला और मेरी ओर बढ़ा दिया "आ तमारा माते" (ये तुम्हारे लिए)

"ओह ... थैंक्यू रश्मी !" मैंने अपना बाएं हाथ से वो गुलाब ले लिया और अपना दायाँ हाथ उसकी ओर मिलाने को बढ़ा दिया।

उसने मेरा हाथ थाम लिया और बोली "हवे ताव जेवु लागतु तो नथी " (अब तो बुखार नहीं लगता)

"हाँ आज ठीक है। कल तो बुरी हालत थी !"

उसने मेरे माथे को भी छू कर देखा। मुझे तो पसीने आ रहे थे। उसने अपने रुमाल से मेरे माथे पर आया पसीना पोंछा और फिर रुमाल वहीं सिरहाने के पास रख दिया। शान्ती बाई चाय बना कर ले आई। चाय पीते हुए रश्मी ने पूछा "कल तो ट्यूशन पर आओगे ना ?"

"हाँ कल तो मैं स्कूल और ट्यूशन दोनों पर जरूर आऊंगा। तुम से मिठाई भी तो खानी है ना ?

"केवी मिठाई " (कैसी मिठाई)

"अरे तुम्हारे जन्मदिन की और कौन सी ? तुमने मुझे अपने जन्मदिन पर तो बुलाया ही नहीं अब क्या मिठाई भी नहीं खिलाओगी ?" मैंने उलाहना दिया तो वो बोली "ओह.... अरे......ते........ओह......सारु .........तो .......काले खवदावी देवा" (ओह... अरे... वो... ओह... अच्छा... वो... चलो कल खिला दूंगी)

पता नहीं उसके चहरे पर जन्मदिन की कोई ख़ुशी नहीं नज़र आई। अलबत्ता वो कुछ संजीदा (गंभीर) जरूर हो गई पता नहीं क्या बात थी।

चाय पी कर रश्मी चली गई। मैंने देखा उसका लाल रुमाल तो वहीं रह गया था। पता नहीं आज रश्मी इस रुमाल को कैसे भूल गई वर्ना तो वह इस रुमाल को कभी अपने से जुदा नहीं करती ?

मैंने उस रुमाल को उठा कर अपने होंठों पर लगा लिया। आह... मैं यह सोच कर तो रोमांचित ही हो उठा कि इसी रुमाल से उसने अपने उन नाज़ुक होंठों को भी छुआ होगा। मैंने एक बार फिर उस रुमाल को चूम लिया। उसे चूमते हुए मेरा ध्यान उस पर बने दिल के निशान पर गया। ओह... यह रुमाल तो किसी जमाने में लाहौर के अनारकली बाज़ार में मिला करते थे। ऐसा रुमाल सोहनी ने अपने महिवाल को चिनाब दरिया के किनारे दिया था और महिवाल उसे ताउम्र अपने गले में बांधे रहा था। ऐसी मान्यता है कि ऐसा रुमाल का तोहफा देने से उसका प्रेम सफल हो जाता है। रश्मी ने बाद में मुझे बताया था कि यह रुमाल उसने अपने नानके (ननिहाल) पटियाला से खरीदा था। आजकल ये रुमाल सिर्फ पटियाला में मिलते हैं। पहले तो इन पर दो पक्षियों के चित्र से बने होते थे पर आजकल इन पर दो दिल बने होते हैं। इस रुमाल पर दोनों दिलों के बीच में र और पी के अक्षर बने थे। मैंने सोचा शायद रश्मी पटेल लिखा होगा। पर बीच में + का निशान क्यों बना था मेरी समझ में नहीं आया।

मैंने एक बार उस गुलाब और इस रुमाल को फिर से चूम लिया। मैंने कहीं पढ़ा था सुगंध और सौन्दर्य का अनुपम समन्वय गुलाब सदियों से प्रेमिकाओं को आकर्षित करता रहा है। लाल गुलाब मासूमियत का प्रतीक होता है। अगर किसी को भेंट किया जाए तो यह सन्देश जाता है कि मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। ओह... अब मैं समझा कि R+P का असली अर्थ तो रश्मी और प्रेम है। मैंने उस रुमाल को एक बार फिर चूम लिया और अपने पास सहेज कर रख लिया। ओह ... मेरी रश्मी मैं भी तुम्हें सचमुच बहुत प्रेम करने लगा हूँ ....

अगले दिन मैं थोड़ी जल्दी ट्यूशन पर पहुंचा। रश्मी प्रोफ़ेसर के घर के नीचे पता नहीं कब से मेरा इंतज़ार कर रही थी। जब मैंने उसकी ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखा तो उसने अपना सिर झुका लिया। अब मैं इतना गाउदी (मकाउ) भी नहीं रहा था कि इसका अर्थ न समझूं। मेरा दिल तो जैसे रेल का इंजन ही बना था। मैंने कांपते हाथों से उसकी ठोड़ी को थोड़ा सा ऊपर उठाया। उसकी तेज और गर्म साँसें मैं अच्छी तरह महसूस कर रहा था। उसके होंठ भी जैसे काँप रहे थे। उसकी आखों में भी लाल डोरे से तैर रहे थे। उसे भी कल रात भला नींद कहाँ आई होगी। भले ही हम दोनों ने एक दूसरे से एक शब्द भी नहीं कहा पर मन और प्रेम की भाषा भला शब्दों की मोहताज़ कहाँ होती है। बिन कहे ही जैसे एक दूसरे की आँखों ने सब कुछ तो बयान कर ही दिया था।

ट्यूशन के बाद आज हम दोनों का ही टेनिस खेलने का मूड नहीं था। हम दोनों खेल मैदान में बनी बेंच पर बैठ गए।

मैंने चुप्पी तोड़ी "रश्मी, क्या सोच रही हो ?"

"कुछ नहीं !" उसने सिर झुकाए ही जवाब दिया।

"रमो एक बात सच बताऊँ ?"

"क्या ?"

"रमो वो... वो दरअसल..." मेरी तो जबान ही साथ नहीं दे रही थी। गला जैसे सूख गया था।

"हूँ ..."

"मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ ?"

" ?" उसने प्रश्न वाचक निगाहों से मुझे ताका।

"मैं ... मैं ... तुम से प ... प ... प्रेम करने लगा हूँ रमो ?" पता नहीं मेरे मुंह से ये शब्द कैसे निकल गए।

"हूँ ... ?"

"ओह ... तुम कुछ बोलोगी नहीं क्या ?"

"नहीं ?"

"क ... क ... क्यों ?"

"हूँ नथी कहेती के तमारी बुद्धि बेहर मारी जाय छे कोई कोई वार ?" (मैं ना कहती थी कि तुम्हारी अक्ल घास चरने चली जाती है कई बार ?) और वो खिलखिला कर हंस पड़ी। हंसते हुए उसने अपनी तर्जनी अंगुली अपनी कनपटी पर लगा कर घुमा दी।
[Image: 52.gif]
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#8
24-11-2014, 12:12 AM
सच पूछो तो मुझे पहले तो कुछ समझ ही नहीं आया। मैं तो सोच रहा था कहीं रश्मी नाराज़ ही ना हो जाए। पर बाद में तो मेरे दिल की धड़कनों की रफ़्तार ऐसी हो गई जैसे कि मेरा दिल हलक के रास्ते बाहर ही आ जाएगा। अब आप मेरी हालत का अंदाजा लगा सकते हैं कि मैंने अपने आप को कैसे रोका होगा। थोड़ी दूर कुछ लड़के और लड़कियां खेल रहे थे। कोई सुनसान जगह होती तो मैं निश्चित ही उसे अपनी बाहों में भर कर चूम लेता पर उस समय और उस जगह ऐसा करना मुनासिब नहीं था। मैंने रश्मी का हाथ अपने हाथ में ले कर चूम लिया।

प्रेम को बयान करना जितना मुश्किल है महसूस करना उतना ही आसान है। प्यार किस से, कब, कैसे और कहाँ हो जाएगा कोई नहीं जानता। वो पहली नजर में भी हो सकता है और हो सकता है कई मुलाकातों के बाद हो।

"रमो ?"

"हूँ ... ?"

"रमो तुमने मुझे अपने जन्मदिन की मिठाई तो खिलाई ही नहीं ?" उसने मेरी ओर इस तरह देखा जैसे मैं निरा शुतुरमुर्ग ही हूँ। उसकी आँखें तो जैसे कह रही थी कि ‘जब पूरी थाली मिठाई की भरी पड़ी है तुम्हारे सामने तुम बस एक टुकड़ा ही मिठाई का खाना चाहते हो ?"

"एक शेर सम्भादावु?" (एक शेर सुनाऊं) रश्मी ने चुप्पी तोड़ी। कितनी हैरानी की बात थी इस मौके पर उसे शेर याद आ रहा था।

"ओह ... हाँ ... हाँ ...?" मैंने उत्सुकता से कहा।

रश्मी ने गला खंखारते हुए कहा "अर्ज़ किया है :

वो मेरे दिल में ऐसे समाये जाते हैं.... ऐसे समाये जाते हैं ...

जैसे कि... बाजरे के खेत में कोई सांड घुसा चला आता हो ?"

हंसते हँसते हम दोनों का बुरा हाल हो गया। उस एक शेर ने तो सब कुछ बयान कर दिया था। अब बाकी क्या बचा था।

"आ जाड़ी बुध्धिमां कई समज आवी के नहीं?" (इस मोटी बुद्धि में कुछ समझ आया या नहीं) और फिर उसने एक अंगुली मेरी कनपटी पर लगा कर घुमा दी।

"ओह ... थैंक्स रमो ... मैं ... मैं ... बी ... बी ... ?"

"बस बस हवे, शाहरुख खान अने दिलीप कुमार न जेवी एक्टिंग करवा नी कोई जरुरत नथी मने खबर छे के तमने एक्टिंग करता नथी आवडती" (बस बस अब शाहरुख खान और दिलीप कुमार की तरह एक्टिंग करने की कोई जरुरत नहीं है? मैं जानती हूँ तुम्हें एक्टिंग करनी भी नहीं आती)

"सिम ... रश्मी यार बस एक चुम्मा दे दो ना ? मैं कितने दिनों से तड़फ रहा हूँ ? देखो तुमने वादा किया था ?"

"केवूँ वचन ? में कदी एवुं वचन आप्युं नथी" (कौन सा वादा ? मैंने ऐसा कोई वादा नहीं किया)

"तुमने अपने वादे से मुकर रही हो ?"

"ना, फ़क्त मिठाई नी ज वात थई हटी ?" (नहीं बस मिठाई की बात हुई थी)

"ओह ... मेरी प्यारी सोनचिड़ी चुम्मा भी तो मिठाई ही है ना ? तुम्हारे कपोल और होंठ क्या किसी मिठाई से कम हैं ?"

"छट गधेड़ा ! कुंवारी छोकरी ने कदी पुच्ची कराती हशे ?" (धत्त.... ऊँट कहीं के... कहीं कुंवारी लड़की का भी चुम्मा लिया जाता है?)

"प्लीज... बस एक बार इन होंठों को चूम लेने दो ! बस एक बार प्लीज !"

"ओह्हो ....एम् छे !!! हवे हूँ समजी के तमारी बुध्धि घास खाईने पाछी आवी गई छे! हवे अहि तमने कोई मिठाई - बिठाई मलवानी नथी? हवे घरे चालो" (ओहहो... अच्छा जी ! मैं अब समझी तुम्हारी बुद्धि घास खा कर वापस लौट आई है जी ? अब यहाँ आपको कोई मिठाई विठाई नहीं मिलेगी ? अब चलो घर) रश्मी मंद मंद मुस्कुरा रही थी।

"क्या घर पर खिलाओगी ?" मैंने किसी छोटे बच्चे की तरह मासूमियत से कहा।

"हट ! गन्दा छोकरा ?" (चुप... गंदे बच्चे)

रश्मी तो मारे शर्म से दोहरी ही हो गई उसके गाल इस कदर लाल हो गए जैसे कोई गुलाब या गुडहल की कलि अभी अभी चटक कर खिली है। और मैं तो जैसे अन्दर तक रोमांच से लबालब भर गया जिसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता। क्यों कि मैं शायरों और अदीबों (साहित्यकारों) की प्रणय और श्रृंगाररस की भाषा कहाँ जानता हूँ। मैं तो सीधी सादी ठेठ भाषा में कह सकता हूँ कि अगर इस मस्त मोरनी के लिए कोई मुझे कुतुबमीनार पर चढ़ कर उसकी तेरहवी मंजिल से छलांग लगाने को कह दे तो मैं आँखें बंद करके कूद पडूँ। प्रेम की डगर बड़ी टेढ़ी और अंधी होती है।
घर आकर मैंने दो बार मुट्ठ मारी तब जा कर लंड महाराज ने सोने दिया।
[Image: 52.gif]
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24-11-2014, 12:13 AM
उसके बाद तो हम दोनों ही पहरों आपस में एक दूसरे का हाथ थामें बतियाते रहते। पता नहीं एक दूजे को देखे बिना हमें तो जैसे चैन ही नहीं आता था। धीरे धीरे हमारा प्रेम परवान चढने लगा। अब रश्मी ने अपने बारे में बताना चालू कर दिया। उसके माँ बाप ने प्रेम-विवाह किया था। दोनों ही नौकरी करते हैं। कुछ सालों तक तो सब ठीक रहा पर अब तो दोनों ही आपस में झगड़ते रहते हैं। रश्मी के 19वें जन्मदिन पर भी उन दोनों में सुबह सुबह ही तीखी झड़प हुई थी। और रश्मी का जन्मदिन भी उसी की भेंट चढ़ गया। रश्मी तो बेचारी रोती ही रह गई। उसने बाद में एक बार मुझे कहा थी कि वो तो घर से भाग जाना चाहती है। कई बार तो वो इन दोनों को झगड़ते हुए देख कर जहर खा लेने का सोचने लगती है। उसकी मम्मी उसे रम्मी के नाम से बुलाती है और उसके पापा उसे रमो या फिर जब कभी अच्छे मूड में होते हैं तो निक्कुड़ी बुलाते है। गुजरात और राजस्थान में छोटी लड़कियों के इस तरह के नाम (निक्कुड़ी, मिक्कुड़ी, झमकुड़ी और किट्टूड़ी आदि) बड़े प्यार से लिए जाते हैं।

मैंने उसे पूछा था कि मैं उसे किस नाम से बुलाया करूँ तो वो कुछ सोचते हुए बोली "सिम... रमो ...? ओह... निकू ... चलेगा ?"

"निक्कुड़ी बोलूँ तो ?"

"पता है निक्कुड़ी का एक और भी मतलब होता है ?"

"क्या ?"

"छट ! गंदो दीकरो ! ... तू गैहलो छे के ?" (धत्त ... तुम पागल तो नहीं हुए हो?) उसने शर्माते हुए कहा।

पता नहीं ‘निक्कुड़ी’ का दूसरा मतलब क्या होता है। जब कुछ समझ नहीं आया तो मैंने कहा "सिमसिम कैसा रहेगा ?"

"ओह... ?"

"अलीबाबा की खुल जा मेरी सिमसिम कि तरह बहुत खूबसूरत रहेगा ना ?"

और हम दोनों ही हंस पड़े थे। मैंने भी उसे अपने बारे में बता दिया। मेरी मॉम का एक साल पहले देहांत हो गया था और बापू सरकारी नौकरी में थे। मुझे होस्टल में भेजना चाहते थे पर मौसी ने कहा कि इसे +2 कर लेने दो फिर मैं अपने साथ ले जाउंगी। मेरा भी सपना था कि कोई मुझे प्रेम करे। दरअसल हम दोनों ही किसी ना किसी तरह प्रेम के प्यासे थे। हम दोनों ने अपने भविष्य के सपने बुनने शुरू कर दिए थे। पढ़ाई के बाद दोनों शादी कर लेंगे। प्रेम का पूरा रंग दोनों पर चढ़ चुका था। और हमने भी किसी प्रेमी जोड़े की तरह एक साथ जीने मरने की कसमें खा ली थी।

दोस्तों ! अब दिल्ली दूर तो नहीं रही थी पर सवाल तो यह था ना कि कब, कहाँ और कैसे ? प्रेम आश्रम वाले गुरुजी कहते हैं कि पानी और लंड अपना रास्ता अपने आप बना लेते हैं।

अगले तीन दिन फिर रश्मी ट्यूशन से गायब रही। आप मेरी हालत का अंदाजा लगा सकते हैं ये तीन दिन और तीन रातें मैंने कैसे बिताई होंगी। मैंने इन तीन दिनों में कम से कम सात-आठ बार तो मुट्ठ जरूर मारी होगी।

आज तो सुबह-सुबह दो बार मारनी पड़ी थी। आप सोच रहे होंगे अजीब पागल है यार ! भला सुबह-सुबह दो बार मुट्ठ मारने की क्या जरुरत पड़ गई। ओह ... मैं समझाता हूँ। दरअसल आज नहाते समय मुझे लगा कि मेरे झांट कुछ बढ़ गए हैं। इन्हें साफ़ करना जरुरी है। जैसे ही मैंने उन्हें साफ़ करना शुरू किया तो प्यारेलालजी खड़े होकर सलाम बजाने लगे। उनका जलाल तो आज देखने लायक था। सुपाड़ा तो इतना फूला था जैसे कि मशरूम हो और रंग लाल टमाटर जैसा। अब मैं क्या करता। उसे मार खाने की आदत जो पड़ गई थी। मार खाने और आंसू बहाने के बाद ही उसने मुझे आगे का काम करने दिया। जब मैंने झांट अच्छी तरह काट लिए और अच्छी तरह नहाने के बाद शीशे में अपने आप को नंगा देखा तो ये महाराज फिर सिर उठाने लग गए। मुझे उस पर तरस भी आया और प्यार भी। इतना गोरा चिट्टा और लाल टमाटर जैसा टोपा देख कर तो मेरा जी करने लगा कि इसका एक चुम्मा ही ले लूं। पर यार अब आदमी अपने लंड का चुम्मा खुद तो नहीं ले सकता ना ? मुझे एक बार फिर मुट्ठ मारनी पड़ी।

मुझे ट्यूशन पर पहुँचाने में आज देर हो गई। रश्मी मुझे सामने से आती मिली। उसने बताया कि प्रोफ़ेसर आज कहीं जाने वाला है नहीं पढ़ायेगा। हम वापस घर के लिए निकल पड़े। रास्ते में मैंने रश्मी को उलाहना दिया,"सिमसिम, तुम तीन दिन तक कहाँ गायब रही ?"

"ओह... वो... वो... ओह... हम लड़कियों के परेशानी तुम नहीं समझ सकते ?" उसने मेरी ओर इस तरह देखा जैसे कि मैं कोई शुतुरमुर्ग हूँ। मेरी समझ में सच पूछो तो कुछ नहीं आया था। रश्मी पता नहीं आज क्यों उदास सी लग रही थी। लगता है वो आज जरूर रोई है। उसकी आँखें लाल हो रही थी।

"रश्मी आज तुम कुछ उदास लग रही हो प्लीज बताओ ना ? क्या बात है ?"

"नहीं कोई बात नहीं है" उसने अपनी मुंडी नीचे कर ली। मुझे लगा कि वो अभी रो देगी।

"रश्मी आज टेनिस खेलने का मूड नहीं है यार चलो घर ही चलते हैं ?"

"नहीं मैं उस नरक में नहीं जाउंगी ?"

"अरे क्या बात हो गई ? तुम ठीक तो हो ना ?"

"कोई मुझे प्यार नहीं करता ना मॉम ना पापा। दोनों छोटी छोटी बातों पर झगड़ते रहते हैं !"

"ओह।" मैं क्या बोलता।

"ओके अगर तुम कहो तो मेरे घर पर चलें ? वहीं पर चल कर पढ़ लेते हैं। अगले हफ्ते टेस्ट होने वाले हैं। क्या ख़याल है ?"

मुझे लगा था रश्मी ना कर देगी। पर उसने हाँ में अपनी मुंडी हाँ में हिला दी।
[Image: 52.gif]
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24-11-2014, 12:25 PM
Very nice story and explanation is awesome 10/10
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