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Incest Dewar Bhabi Ki Chudai (देवर भाभी की चुदाई)

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Incest Dewar Bhabi Ki Chudai (देवर भाभी की चुदाई)
rajbr1981 Online
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#11
24-03-2018, 11:20 PM (This post was last modified: 24-03-2018, 11:23 PM by rajbr1981.)
प्रेषक : नामालूम
सम्पादक : जूजा जी
‘तुम्हारी कसम मेरी जान… इतनी फूली हुई चूत को छोड़ कर तो मैं धन्य हो गया हूँ और फिर इसकी मालकिन चुदवाती भी तो कितने प्यार से है।’
‘जब चोदने वाले का लंड इतना मोटा तगड़ा हो तो चुदवाने वाली तो प्यार से चुदवाएगी ही.. मैं तो आपके लंड के लिए उई…ह.. ऊ.. बहुत तड़फूंगी.. आख़िर मेरी प्यास तो…आआ… यही बुझाता है।’
भैया ने सारी रात जम कर भाभी की चुदाई की… सवेरे भाभी की आँखें सारी रात ना सोने के कारण लाल थीं।
भैया सुबह 6 महीने के लिए मुंबई चले गए। मैं बहुत खुश था, मुझे पूरा विश्वास था कि इन 6 महीनों में तो मैं भाभी को अवश्य ही चोद पाऊँगा।
हालाँकि अब भाभी मुझसे खुल कर बातें करती थीं लेकिन फिर भी मेरी भाभी के साथ कुछ कर पाने की हिम्मत नहीं हो पा रही थी।
मैं मौके की तलाश में था।
भैया को गए हुए एक महीना बीत चुका था। जो औरत रोज चुदवाने को तरसती हो उसके लिए एक महीना बिना चुदाई गुजारना मुश्किल था।
भाभी को वीडियो पर पिक्चर देखने का बहुत शौक था। एक दिन मैं इंग्लिश की बहुत सेक्सी सी ब्लू-फिल्म ले आया और ऐसी जगह रख दी, जहाँ भाभी को नजर आ जाए।
उस पिक्चर में 7 इन्च लम्बे लौड़े वाला तगड़ा काला आदमी एक किशोरी गोरी लड़की को कई मुद्राओं में चोदता है और उसकी गाण्ड भी मारता है।
जब तक मैं कॉलेज से वापस आया तब तक भाभी वो पिक्चर देख चुकी थीं।
मेरे आते ही बोलीं- यह तू कैसी गंदी-गंदी फ़िल्में देखता है?
‘अरे भाभी आपने वो पिक्चर देख ली? वो आपके देखने की नहीं थी।’
‘तू उल्टा बोल रहा है.. वो मेरे ही देखने की थी.. शादीशुदा लोगों को तो ऐसी पिक्चर देखनी चाहिए.. हे राम… क्या-क्या कर रहा था वो लम्बा-तगड़ा कालू.. उस छोटी सी लड़की के साथ.. बाप रे…!’
‘क्यों भाभी, भैया आपके साथ ये सब नहीं करते हैं?’
‘तुझे क्या मतलब…? और तुझे शादी से पहले ऐसी फ़िल्में नहीं देखनी चाहिए।’
‘लेकिन भाभी अगर शादी से पहले नहीं देखूँगा तो अनाड़ी न रह जाऊँगा। पता कैसे लगेगा कि शादी के बाद क्या किया जाता है।’
‘तेरी बात तो सही है.. बिल्कुल अनाड़ी होना भी ठीक नहीं.. वरना सुहागरात को लड़की को बहुत तकलीफ़ होती है। तेरे भैया तो बिल्कुल अनाड़ी थे।’
‘भाभी, भैया अनाड़ी थे क्योंकि उन्हें बताने वाला कोई नहीं था। मुझे तो आप समझा सकती हैं लेकिन आपके रहते हुए भी मैं अब तक अनाड़ी हूँ। तभी तो ऐसी फिल्म देखनी पड़ती हैं और उसके बाद भी बहुत सी बातें समझ नहीं आती। खैर.. आपको मेरी फिकर कहाँ होती है?’
‘राजू, मैं जितनी तेरी फिकर करती हूँ उतनी शायद ही कोई करता हो। आगे से तुझे शिकायत का मौका नहीं दूँगी। तुझे कुछ भी पूछना हो, बे-झिझक पूछ लिया कर। मैं बुरा नहीं मानूँगी। चल अब खाना खा ले।’
‘तुम कितनी अच्छी हो भाभी।’ मैंने खुश हो कर कहा।
अब तो भाभी ने खुली छूट दे दी थी, मैं किसी तरह की भी बात भाभी से कर सकता था लेकिन कुछ कर पाने की अब भी हिम्मत नहीं थी।
मैं भाभी के दिल में अपने लिए चुदाई की भावना जागृत करना चाहता था।
भैया को गए अब करीब दो महीने हो चले थे, भाभी के चेहरे पर लंड की प्यास साफ ज़ाहिर होती थी।
एक बार रविवार को मैं घर पर था, भाभी कपड़े धो रही थीं, मुझे पता था कि भाभी छत पर कपड़े सूखने डालने जाएगीं।
मैंने सोचा क्यों ना आज फिर भाभी को अपने लंड के दर्शन कराए जाएँ, पिछले दर्शन तीन महीने पहले हुए थे।
मैं छत पर कुर्सी डाल कर उसी प्रकार लुंगी घुटनों तक उठा कर बैठ गया।
जैसे ही भाभी के छत पर आने की आहट सुनाई दी, मैंने अपनी टाँगें फैला दीं और अख़बार चेहरे के सामने कर लिया।
अख़बार के छेद में से मैंने देखा की छत पर आते ही भाभी की नजर मेरे मोटे, लम्बे साँप के माफिक लटकते हुए लंड पर गई।
भाभी की सांस तो गले में ही अटक गई, उनको तो जैसे साँप सूंघ गया, एक मिनट तक तो वो अपनी जगह से हिल नहीं सकीं, फिर जल्दी कपड़े सूखने डाल कर नीचे चल दीं।
‘भाभी कहाँ जा रही हो, आओ थोड़ी देर बैठो।’ मैंने कुर्सी से उठते हुए कहा।
भाभी बोली- अच्छा आती हूँ… तुम बैठो मैं तो नीचे चटाई डाल कर बैठ जाऊँगी।
अब तो मैं समझ गया कि भाभी मेरे लंड के दर्शन जी भर के करना चाहती हैं, मैं फिर कुर्सी पर उसी मुद्रा में बैठ गया।
थोड़ी देर में भाभी छत पर आईं और ऐसी जगह चटाई बिछाई जहाँ से लुंगी के अन्दर से पूरा लंड साफ दिखाई दे।
उनके हाथ में एक उपन्यास था जिसे पढ़ने का बहाना करने लगीं लेकिन नज़रें मेरे लंड पर ही टिकी हुई थीं।
मेरा 8′ लम्बा और 4′ मोटा लंड और उसके पीछे अमरूद के आकार के अंडकोष लटकते देख उनका तो पसीना ही छूट गया।
अनायास ही उनका हाथ अपनी चूत पर गया और वो उसे अपनी सलवार के ऊपर से रगड़ने लगीं। जी भर के मैंने भाभी को अपने लंड के दर्शन कराए।
जब मैं कुर्सी से उठा तो भाभी ने जल्दी से उपन्यास अपने चेहरे के आगे कर लिया, जैसे वो उपन्यास पढ़ने में बड़ी मग्न हों।
मैंने कई दिन से भाभी की गुलाबी कच्छी नहीं देखी थी। आज भी वो नहीं सूख रही थी।
मैंने भाभी से पूछा- भाभी बहुत दिनों से आपने गुलाबी कच्छी नहीं पहनी?
‘तुझे क्या?’
‘मुझे वो बहुत अच्छी लगती है। उसे पहना करिए ना।’
‘मैं कौन सा तेरे सामने पहनती हूँ?’
‘बताईए ना भाभी कहाँ गई, कभी सूखती हुई भी नहीं नजर आती।’
‘तेरे भैया ले गए हैं.. कहते थे कि वो उन्हें मेरी याद दिलाएगी।’ भाभी ने शरमाते हुए कहा।
‘आपकी याद दिलाएगी या आपके टांगों के बीच में जो चीज़ है उसकी?’
‘हट मक्कार.. तूने भी तो मेरी एक कच्छी मार रखी है, उसे पहनता है क्या? पहनना नहीं, कहीं फट ना जाए।’ भाभी मुझे चिढ़ाते हुए बोलीं।
‘फटेगी क्यों? मेरे कूल्हे आपके जितने भारी और चौड़े तो नहीं हैं।’
‘अरे बुद्धू, कूल्हे तो बड़े नहीं हैं लेकिन सामने से तो फट सकती है। तुझे तो वो सामने से फिट भी नहीं होगी।’
‘फिट क्यों नहीं होगी भाभी?’ मैंने अंजान बनते हुए कहा।
‘अरे बाबा, मर्दों की टांगों के बीच में जो ‘वो’ होता है ना, वो उस छोटी सी कच्छी में कैसे समा सकता है और वो तगड़ा भी तो होता है, कच्छी के महीन कपड़े को फाड़ सकता है।’
‘वो’.. क्या भाभी?’ मैंने शरारत भरे अंदाज में पूछा।
भाभी जान गईं कि मैं उनके मुँह से क्या कहलवाना चाहता हूँ।
‘मेरे मुँह से कहलवाने में मज़ा आता है?’
‘एक तरफ तो आप कहती हैं कि आप मुझे सब कुछ बताएँगी और फिर साफ-साफ बात भी नहीं करती। आप मुझसे और मैं आपसे शरमाता रहूँगा तो मुझे कभी कुछ नहीं पता लगेगा और मैं भी भैया की तरह अनाड़ी रह जाऊँगा। बताइए ना..!’
‘तू और तेरे भैया दोनों एक से हैं। मेरे मुँह से सब कुछ सुन कर तुझे ख़ुशी मिलेगी?’
‘हाँ.. भाभी बहुत ख़ुशी मिलेगी और फिर मैं कोई पराया हूँ।’
‘ऐसा मत बोल राजू… तेरी ख़ुशी के लिए मैं वही करूँगी जो तू कहेगा।’
‘तो फिर साफ-साफ बताईए आपका क्या मतलब था।’
‘मेरे बुद्धू देवर जी, मेरा मतलब यह था कि मर्द का वो बहुत तगड़ा होता है औरत की नाज़ुक कच्छी उसे कैसे झेल पाएगी? और अगर वो खड़ा हो गया तब तो फट ही जाएगी ना।’
‘भाभी आपने ‘वो… वो’ क्या लगा रखी है, मुझे तो कुछ नहीं समझ आ रहा।’
‘अच्छा अगर तू बता दे उसे क्या कहते है तो मैं भी बोल दूँगी।’ भाभी ने लजाते हुए कहा।
‘भाभी मर्द के उसको लंड कहते हैं।’
‘हाँ… मेरा भी मतलब यही था।’
‘क्या मतलब था आपका?’
‘कि तेरा लंड मेरी कच्छी को फाड़ देगा। अब तो तू खुश है ना?’
यह हिन्दी सेक्स कहानी आप देसिबीस डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं ।
‘हाँ भाभी बहुत खुश हूँ। अब ये भी बता दीजिए कि आपकी टांगों के बीच में जो है, उसे क्या कहते हैं।’
‘उसे..! मुझे तो नहीं पता.. ऐसी चीज़ें तो तुझे ही पता होती हैं, तू ही बता दे।’
‘भाभी उसे चूत कहते हैं।’
‘हाय.. तुझे तो शर्म भी नहीं आती… वही कहते होंगे।’
‘वही क्या भाभी?’
‘ओह हो.. बाबा, चूत और क्या।’ भाभी के मुँह से लंड और चूत जैसे शब्द सुन कर मेरा लंड फनफनाने लगा। अब तो मेरी हिम्मत और बढ़ गई।
मैंने भाभी से कहा- भाभी, इसी चूत की तो दुनिया इतनी दीवानी है।
‘अच्छा जी तो देवर जी भी इसके दीवाने हैं।’
‘हाँ मेरी प्यारी भाभी किसी की भी चूत का नहीं सिर्फ़ आपकी चूत का दीवाना हूँ।’
‘तुझे तो बिल्कुल भी शर्म नहीं है। मैं तेरी भाभी हूँ।’ भाभी झूठा गुस्सा दिखाते हुए बोलीं।
कहानी जारी रहेगी।
 
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24-03-2018, 11:21 PM
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‘ओह हो.. बाबा, चूत और क्या।’ भाभी के मुँह से लंड और चूत जैसे शब्द सुन कर मेरा लंड फनफनाने लगा। अब तो मेरी हिम्मत और बढ़ गई।
मैंने भाभी से कहा- भाभी इसी चूत की तो दुनिया इतनी दीवानी है।
‘अच्छा जी तो देवर जी भी इसके दीवाने हैं?’
‘हाँ मेरी प्यारी भाभी किसी की भी चूत का नहीं सिर्फ़ आपकी चूत का दीवाना हूँ।’
‘तुझे तो बिल्कुल भी शर्म नहीं है। मैं तेरी भाभी हूँ।’ भाभी झूठा गुस्सा दिखाते हुए बोलीं।
‘अगर मैं आपको एक बात बताऊँ तो आप बुरा तो नहीं मानेंगी?’
‘नहीं राजू… देवर-भाभी के बीच तो कोई झिझक नहीं होनी चाहिए और अब तो तूने मेरे मुँह से सब कुछ कहलवा दिया है, लेकिन मेरी कच्छी तो वापस कर दे।’
‘सच कहूँ भाभी, रोज रात को उसे सूंघता हूँ तो आपकी चूत की महक मुझे मदहोश कर डालती है। जब मैं अपना लंड आपकी कच्छी से रगड़ता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे लंड आपकी चूत से रगड़ रहा हो।’
‘ओह.. अब समझी देवर जी मेरी कच्छी के पीछे क्यों पागल हैं.. इसीलिए तो कहती हूँ तुझे एक सुन्दर सी बीवी की जरूरत है।’
‘लेकिन मैं तो अनाड़ी हूँ। आपने तो वादा करके भी कुछ नहीं बताया। उस दिन आप कह रही थीं कि मर्द अनाड़ी हो तो लड़की को सुहागरात में बहुत तकलीफ़ होती है। आपका क्या मतलब था? आपको भी तकलीफ़ हुई थी?’
‘हा राजू, तेरे भैया अनाड़ी थे। सुहागरात को मेरी साड़ी उठा कर बिना मुझे गर्म किए चोदना शुरू कर दिया। अपने 8′ लम्बे और 3′ मोटे लंड से मेरी कुँवारी चूत को बहुत ही बेरहमी से चोदा। बहुत खून निकला मेरी चूत से। अगले एक महीने तक दर्द होता रहा।’
मेरा लंड देखने के बाद से भाभी काफ़ी उत्तेजित हो गई थी और बिल्कुल ही शरमाना छोड़ दिया था।
‘लड़की को गर्म कैसे करते हैं भाभी?’
‘पहले प्यार से उससे बातें करते हैं। फिर धीरे-धीरे उस के कपड़े उतारते हैं। उसके बदन को सहलाते हैं। उसकी होंठों को और चूचियों को चूमते हैं, फिर प्यार से उसकी चूचियों और चूत को मसलते हैं। फिर हल्के से एक ऊँगली उसकी चूत में सरका कर देखते हैं कि लड़की की चूत पूरी तरह गीली है। अगर चूत गीली है, इसका मतलब लड़की चुदने के लिए तैयार है। इसके बाद प्यार से उसकी टाँगें उठा कर धीरे-धीरे लंड अन्दर डाल देते हैं। पहली रात ज़ोर-ज़ोर से धक्के नहीं मारते।’
‘भाभी उस फिल्म में तो वो कालू उस लड़की की चूत चाटता है, लड़की भी लंड चूसती है। कालू उस लड़की को कई तरह से चोदता है। यहाँ तक की उसकी गाण्ड भी मारता है।’
‘अरे बुद्धू, ये सब पहली रात को नहीं किया जाता, धीरे-धीरे किया जाता है।’
‘भाभी, भैया भी वो सब आपके साथ करते हैं?’
‘नहीं रे.. तेरे भैया अनाड़ी थे और अब भी अनाड़ी हैं। उनको तो सिर्फ़ टाँगें उठा कर पेलना आता है। अक्सर तो पूरी तरह नंगी किए बिना ही चोदते हैं। औरत को मज़ा तो पूरी तरह नंगी हो कर ही चुदवाने में आता है।’
‘भाभी आपको नंगी हो कर चुदवाने मे बहुत मज़ा आता है?’
‘क्यों मैं औरत नहीं हूँ? अगर मोटा तगड़ा लंड हो और चोदने वाला नंगी करके प्यार से चोदे तो बहुत ही मज़ा आता है।’
‘लेकिन भैया का लंड तो मोटा-तगड़ा होगा। पर.. हाँ मेरे लंड की बराबरी नहीं कर सकता है।’
‘तुझे कैसे पता?’
‘मुझे तो नहीं पता, लेकिन आप तो बता सकती हैं।’
‘मैं कैसे बता सकती हूँ? मैंने तेरा लंड तो नहीं देखा है।’ भाभी ने बनते हुए कहा।
मैं मन ही मन मुस्कराया और बोला- तो क्या हुआ भाभी.. कहो तो अभी आपको अपने लंड के दर्शन करा देता हूँ, आप नाप लो किसका बड़ा है।’
‘हट बदमाश..!’
‘अगर आप दर्शन नहीं करना चाहती तो कम से कम मुझे तो अपनी चूत के दर्शन एक बार करवा दीजिए। सच भाभी मैंने आज तक किसी की चूत नहीं देखी।’
‘चल नालायक.. तेरी शादी जल्दी करवा दूँगी… इतना उतावला क्यों हो रहा है।’
‘उतावला क्यों ना होऊँ? मेरी प्यारी भाभी को भैया सारी-सारी रात खूब जम कर चोदें और मेरी किस्मत में उनकी चूत के दर्शन तक ना हो। इतनी खूबसूरत भाभी की चूत तो और भी लाजवाब होगी। एक बार दिखा दोगी तो घिस तो नहीं जाओगी। अच्छा, इतना तो बता दो कि आपकी चूत भी उतनी ही चिकनी है जितनी फिल्म में उस लड़की की थी?’
‘नहीं रे, जैसे मर्दों के लंड के चारों तरफ बाल होते हैं वैसे ही औरतों की चूत पर भी बाल होते हैं। उस लड़की ने तो अपने बाल शेव कर रखे थे।’
‘भाभी तब तो जितने घने और सुन्दर बाल आपके सिर पर है उतने ही घने बाल आपकी चूत पर भी होंगे? आप अपनी चूत के बाल शेव नहीं करती?’
‘तेरे भैया को मेरी झांटें बहुत पसंद हैं इसलिए शेव नहीं करती।’
‘हाय भाभी.. आपकी चूत की एक झलक पाने के लिए कब से पागल हो रहा हूँ और कितना तड़पाओगी?’
‘सबर कर, सबर कर… सबर का फल हमेशा मीठा होता है।’ यह कह कर बारे ही कातिलाना अंदाज में मुस्कराती हुई नीचे चली गईं।
मेरे लंड के दुबारा दर्शन करने के बाद से तो भाभी का काफ़ी बुरा हाल था।
एक दिन मैंने उनके कमरे में मोटा सा खीरा देखा। मैंने उसे सूंघ कर देखा तो खीरे में से भी वैसी ही महक आ रही थी जैसी भाभी की कच्छी में से आती थी। लगता था भाभी खीरे से ही चूत की भूख मिटाने की कोशिश कर रही थीं।
मुझे मालूम था की गंदी पिक्चर भी वो कई बार देख चुकी थीं। भैया को गए हुए तीन महीने बीत गए थे।
घर में मोटा-ताज़ा लंड मौज़ूद होने के बावज़ूद भी भाभी लंड की प्यास में तड़प रही थीं।
मैंने एक और प्लान बनाया। बाज़ार से एक हिन्दी का बहुत ही कामुक उपन्यास लाया जिसमें देवर-भाभी की चुदाई के किस्से थे। उस उपन्यास में भाभी अपने देवर को रिझाती है। वो जानबूझ कर कपड़े धोने इस प्रकार बैठती है कि उसके पेटीकोट के नीचे से देवर को उसकी चूत के दर्शन हो जाते हैं। ये उपन्यास मैंने ऐसी जगह रखा, जहाँ भाभी के हाथ लग जाए।
एक दिन जब मैं कॉलेज से वापस आया तो मैंने पाया कि वो उपन्यास अपनी जगह पर नहीं था। मैं जान गया कि भाभी वो उपन्यास पढ़ चुकी हैं।
अगले इतवार को मैंने देखा कि भाभी कपड़े गुसलखाने में धोने के बजाय बरामदे के नलके पर धो रही थीं। उन्होंने सिर्फ़ ब्लाउस और पेटीकोट पहन रखा था।
मुझे देख कर बोलीं- आ राजू बैठ… तेरे कोई कपड़े धोने है तो देदे।
मैंने कहा- मेरे कोई कपड़े नहीं धोने हैं।
मैं भाभी के सामने बैठ गया। भाभी इधर-उधर की गप्पें मारती रहीं। अचानक भाभी के पेटीकोट का पिछला हिस्सा नीचे सरक गया।
सामने का नज़ारा देख कर तो मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई।
भाभी की गोरी-गोरी माँसल जाँघों के बीच में से सफेद रंग की कच्छी झाँक रही थी। भाभी जिस अंदाज में बैठी हुई थीं उसके कारण कच्छी भाभी की चूत पर बुरी तरह कसी हुई थी।
फूली हुई चूत का उभार मानो कच्छी को फाड़ कर आज़ाद होने की कोशिश कर रहा हो। कच्छी चूत के कटाव में धँसी हुई थी। कच्छी के दोनों तरफ से काली-काली झांटें बाहर निकली हुई थीं।
मेरे लंड ने हरकत करनी शुरू कर दी। भाभी मानो बेख़बर हो कर कपड़े धोती जा रही थीं और मुझसे गप्पें मार रही थीं।
अभी मैं भाभी की टांगों के बीच के नज़ारे का मज़ा ले ही रहा था कि वो अचानक उठ कर अन्दर जाने लगीं।
मैंने उदास होकर पूछा- भाभी कहाँ जा रही हो?’
‘बस एक मिनट में आई…’
थोड़ी देर में वो बाहर आईं। उनके हाथ में वही सफेद कच्छी थी जो उन्होंने अभी-अभी पहनी हुई थी।
भाभी फिर से वैसे ही बैठ कर अपनी कच्छी धोने लगी। लेकिन बैठते समय उन्होंने पेटीकोट ठीक से टांगों के बीच दबा लिया।
यह सोच कर कि पेटीकोट के नीचे अब भाभी की चूत बिल्कुल नंगी होगी मेरा मन डोलने लगा। मैं मन ही मन दुआ करने लगा कि भाभी का पेटीकोट फिर से नीचे गिर जाए। शायद ऊपर वाले ने मेरी दुआ जल्दी ही सुन ली।
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25-03-2018, 07:40 PM
Mazedar kahani.
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